पतंगों की रंगीली दुनिया की सैर

अगर आकाश में उड़ती पतंगें आपको लुभाती हैं या फिर आप खुद पतंगबाजी का शौक रखते हैं, तो तमाम काइट्स फेस्टिवल्स आप जैसे शौकीनों के लिए ही हैं। पिछले दिनों अहमदाबाद में एक ऐसा ही फेस्ट हुआ, जहां देश-विदेश के पतंगबाज अनूठी पतंगों के साथ जुटे :

अगर आप वाकई पतंगों की दुनिया में रुचि रखते हैं, तो आप देश-विदेश के काइट्स फेस्टिवल्स के बारे में जरूर जानते होंगे। पिछले दिनों एक ऐसा ही फेस्टिवल आयोजित हुआ, अहमदाबाद में। यह इवेंट 'वाइब्रेंट गुजरात' का एक अहम हिस्सा है। 9 से 12 जनवरी तक चले इस इंटरनैशनल काइट्स फेस्टिवल में पतंगों के नायाब नजारे दिखे।

नर्मदा के किनारे एक खुले मैदान में स्पेन, इटली, वियतनाम, मलयेशिया, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, यूके, चीन समेत लगभग 40 देशों के पतंगबाज अपना कमाल दिखाने जुटे थे, तो देश के भी 11 राज्यों की टीमें यहां हिस्सा लेने आईं। 


इन टीमों में से कई तो पिछले 40 सालों से भी ज्यादा समय से काइट्स फेस्टिवल्स में पतंगों की पेंच लड़ाते आ रहे हैं। और बात सिर्फ पतंगों को उड़ाने की नहीं है, बल्कि इनके ऐसे-ऐसे अंदाज पेश करने की भी है, जिसके बारे में लोग आमतौर पर सोच भी नहीं पाते। तभी तो इस फेस्ट में सादी पतंगों का कोई स्कोप नहीं होता। यहां बात होती है 40 मीटर लंबी पतंग की या फिर 635 स्क्वेयर मीटर की पतंग की, जिसके नीचे कई लोग एक साथ खड़े हो जाएं।

बताते चलें कि फेस्ट में लुक्स, साइज, मेसेज और डिजाइंस के बेस पर इंडियन और फॉरेन कैटिगरी में अवॉर्ड्स भी दिए जाते हैं। हालांकि इन पतंगों को उड़ाना कोई आसान काम नहीं है। नायलॉन की बनी ये पतंगें हैवी होती हैं, तो पतंगबाजों को मौसम की मार भी झेलनी पड़ती है। और हाथ में मांझे से जो जख्म होते हैं, वह अलग।

वैसे, टूरिस्ट्स के लिए ऐसे फेस्ट का एक बड़ा अट्रैक्शन यह होता है कि इसके बहाने उन्हें तमाम देशों के कल्चर को जानने का मौका मिलता है। फिर इसका उपयोग ड्रग्स, ग्लोबल वॉर्मिंग, टेररिज्म जैसे गंभीर मुद्दों पर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए भी किया जाता है।

वैसे, लोगों में भी इस फेस्ट का खासा क्रेज दिखा। तभी तो छुट्टियों के दिन न होने के बावजूद लोग पतंगबाजों के अद्भुत कारनामों को देखने के लिए बड़ी संख्या में जुटे।

न्यू जीलैंड से आए पीटर 40 साल से पतंगों के बिजनेस में हैं और फिलहाल वह 1000 स्क्वेयर मीटर वाली पतंग बनाने में जुटे हैं। वर्ल्ड रेकॉर्ड के लिए इसे वह 23 फरवरी को कुवैत में लॉन्च करेंगे और उनकी कोशिश अगले उस पतंग को इस फेस्ट में भी लाने की है। वैसे , इस बार वह मरीन क्रिएचर्स पर बेस्ड काइट्स लेकर आए , जिनमें से ऑक्टोपस की शेप वाली पतंग उनकी फेवरिट है।

इंडिया की पतंगबाजी व कल्चर के खास कायल दिखे वियतनाम के आंग। वह कहते हैं , ' हमारे यहां इंडियन कल्चर का बहुत क्रेज है और इस फेस्टिवल के बारे में लोग खासतौर पर जानते हैं। वैसे , इंडिया की ही तरह हम भी हर तरफ शांति चाहते हैं और यही संदेश हम अपनी पतंगों के जरिए दे रहे हैं। '

वैसे , महिलाएं भी इसमें कम रुचि नहीं लेतीं। 23 साल की क्लारा यूके से आई थीं। वह फेस्ट की यंगेस्ट कंटस्टेंट्स में से एक थीं और पतंगबाजी में अपने पापा की विरासत आगे बढ़ा रही हैं। उनके पापा पिछले 10 साल से इस फेस्टिवल में शामिल हो रहे हैं। वहीं इस साल का खूबसूरत हैंडीक्राफ्ट वर्क वाली काइट्स की कैटिगरी में फर्स्ट प्राइज जीता मनीषा कंथालिया ने। फेस्ट में हिस्सा लेने का यह उनका दूसरा मौका था। वह कहती हैं , ' इस बार मैंने अपनी पतंग पर राजस्थान का कोलाज उतारा। धीरे - धीरे मैं इंडिया की हर आर्ट फॉर्म को अपनी पतंगों पर उतारना चाहती हूं। '

पतंगबाजी से पिछले 20 सालों से जुड़े हैं विठ्ठल भाई , जिन्हें इस काम के लिए प्रधानमंत्री अवॉर्ड भी मिल चुका है। वह कहते हैं , ' पतंगबाजी आसान खेल नहीं है। मौसम में कभी ठंड होती है , तो कभी तेज धूप परेशान करती है। फिर डोर से हाथ भी अक्सर कट जाता है। लेकिन लोग जब जोश दिलाते हैं , तो ये बातें बिल्कुल परेशान नहीं करतीं। '

बेशक , ये तमाम लोगों के जोश का ही कमाल है कि पतंगें बच्चों के खेल से हटकर अब इंटरनैशनल गेम व करोड़ों की इंडस्ट्री बन चुकी हैं और इसी के साथ यह टूरिजम को भी खासा सपोर्ट दे रही है। 

स्विट्जरलैंड कि सैर

आपको जानकर हैरानी होगी कि आर्थिक मंदी के बावजूद घुमक्कड़ों के पैर रुके नहीं और उन्होंने खूब सैर-सपाटा किया। सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों के डेस्टिनेशंस में भी उनकी दिलचस्पी साफ नजर आई। अकेले स्विट्जरलैंड जाने वाले लोगों की संख्या में ही 24.8 पर्सेंट का इजाफा हुआ है। इन आंकड़ों की जानकारी मिली पिछले दिनों हुई स्विट्जरलैंड टूरिजम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में।

स्विट्जरलैंड टूरिजम इंडिया के एमडी, माइकल मीडर ने बताया कि स्विट्जरलैंड घूमने जाने वाले लोगों में भारतीय चौथे नंबर पर आते हैं। गौरतलब है कि स्विट्जरलैंड के बैसल, ज्यूरिख, जिनेवा और ल्यूसर्न जैसे शहर भारतीयों को हमेशा ही लुभाते रहे हैं। पिलाट्स और टिटलिस माउंटेंस के अलावा शिल्थर्न और मैटरहॉर्न ग्लेशियर पैराडाइज का भी खासा के्रज है। यही नहीं, माउंटेंस की सीरीज वाले इस देश में हाइकिंग, बाइसिकलिंग और गोल्फिंग में भी पर्यटकों की काफी दिलचस्पी रहती है, तो यहां की नाइटलाइफ भी बेमिसाल है।

अगर आप रोमांटिक हॉलिडे पर जाना चाहते हैं, तो टिसिनो जा सकते हैं। यह अकेला स्विस रीजन है, जिसकी ऑफिशल लैंग्वेज इटालियन है। यहां के स्टोन हाउस विलेज, वॉटरफॉल्स, आइलैंड और पाम ट्रीज के नजारे आपको सपनों की दुनिया में ले जाएंगे। 

चेन्नै के टूरिस्ट स्पॉट्स

चेन्नै में आपको घूमने व देखने की बहुत-सी जगहें मिलेंगी। इनमें मंदिर, गार्डन, म्यूजियम, केव्स, बीच, चर्च, वाइल्डलाइफ पार्क वगैरह शामिल हैं। बीच में दिलचस्पी रखते हैं, तो मरीना बीच, इलियट्स और कोवेलंग बीच जरूर जाएं। मरीना बीच पर एक्वेरियम देखना मिस न करें। इतिहास को खंगालने के लिए गुडियम केव्स जाएं। एडवेंचरस ट्रेकर्स और कुछ गांववालों के अलावा यहां कोई और नहीं जाता है। यह जगह चेन्नै से 17 किमी दूर है। आध्यात्मिक रुचि के लिए कपालेश्वर मंदिर देख सकते हैं, जिसे 1250 में निर्मित बताया जाता है। हालांकि मौजूदा स्वरूप 16वीं शताब्दी का है।

8वीं शताब्दी में निर्मित श्री पार्थसारथी मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है। इसे चेन्नै का सबसे पुराना मंदिर बताया जाता है। शहर से बाहर की ओर बने अन्ना जूलॉजिकल पार्क में भी आपको काफी मजा आएगा। सैन थॉम कैथेड्रल चर्च भी आपको लुभाएगा। यह 16वीं शताब्दी की शुरुआत में बना था। यहां के गवर्मेंट म्यूजियम और नैशनल आर्ट गैलरी को देश के बेहतरीन म्यूजियम्स में से एक माना जाता है, जहां आपको हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ी तमाम चीजें देखने को मिलेंगी। साथ ही, यहां पुरानी पेंटिंग्स व हैंडीक्राफ्ट्स भी सहेजे गए हैं। इनके अलावा, आप विवेकानंद हाउस व म्यूजियम भी जरूर देखें, जिसमें स्वामी विवेकानंद की जिंदगी के यादगार पल सिमटे हुए हैं। 

इतिहास की कहानी सुनाता शीशमहल

दिल्ली ने एक लंबा इतिहास देखा है। वक्त के साथ इसकी कुछ धरोहरों में लोगों के खास दिलचस्पी दिखाई, तो कुछ को लोग भूल ही गए। शीशमहल भी ऐसी ही एक धरोहर है, जिसके लिए माना जाता है कि यहां औरंगजेब की ताजपोशी हुई थी, लेकिन लोग इसे कम ही जानते हैं :

लाहौर का 'शालीमार गार्डन' और कश्मीर का 'रॉयल गार्डन', इनका मेल आपको उत्तर-पश्चिम दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में दिखेगा। यहां के सी-डी ब्लॉक के पार्क में एक ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है। लगभग 4 किलोमीटर में फैले इस गार्डन के बीचोबीच है 17वीं शताब्दी की एक इमारत। दरअसल, यह सफेद व लाल पत्थरों व ईंटों से बना एक महल है, जहां मुगल शासक शाहजहां के बेटे औरंगजेब की की ताजपोशी हुई थी। बताया जाता है कि यह ऐतिहासिक इमारत 350 साल पुरानी है और इसका एक हिस्सा आज भी मौजूद है। वैसे, इसी जगह पर पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह को कैद करके रखा गया था। मगल शासकों का अस्तित्व समाप्त होने के बाद दिल्ली में ब्रिटिश सरकार के रेजिडेंट कमिश्नर सर डेविड ऑचर्लोनी (Sir David Ochterlony) रहा करते थे।

वक्त बीतने के साथ-साथ महल की चमक भी जाती रही। बहुत कुछ बदलाव आया। महल के एक बड़े हिस्से का अस्तित्व मिट गया है, लेकिन ऐसी कई इमारतें और उससे जुड़ी चीजें आज भी मौजूद हैं। ये चीजें मुगल इतिहास को बखूबी बयान करते हैं। 


 सभी के लिए खास
रिसर्च से जुड़े कई स्टूडेंट्स वहां आते हैं। इक्का दुक्क देशी-विदेशी टूरिस्ट भी आते हैं। गार्डन के भीतर कुछ दूर जाने पर शहर का शोरशराबा आमतौर पर पता नहीं चलता। सुबह के समय बिल्कुल शांत माहौल होता है। ऐसा लगता है मानों वह दिल्ली का हिस्सा ही नहीं है। वैसे तो, सुबह के समय आसपास के सैकड़ों लोग नियमित तौर पर सैर के लिए आते हैं, लेकिन इसके बाद आसपास के लोगों के आने का सिलसिला शाम तक लगा रहता है। कोई आराम करता मिल जाएगा, तो कोई बच्चों के साथ पिकनिक मनाने में मशगूल।

गार्डन की बाउंड्री कई जगहों से टूटी हुई है। पैदल चलने वालों के लिए गार्डन के बीचोबीच कई रास्ते हैं, जो हैदर पुर और पीतमपुरा इलाके को जोड़ते हैं। इन रास्तों को गार्डन की बाउंड्री टूटने के बाद लोगों ने खुदबखुद बना लिया है। बुजुर्ग भी इस गार्डन में खूब एंजॉय करते हैं। कहीं ताश का मजमा लग हुआ मिलेगा, तो कहीं राजनीति पर गर्मागरम बहस सुनाई देगी।

बात वापस शीश महल की करें, तो इसका निर्माण मुगल शासक शाहजहां ने 1653 में करवाया था। 31 जुलाई 1658 को औरंगजेब ने यहीं अपना राज्यभिषेक करवाया। कश्मीर, पंजाब और लाहौर की यात्रा के दौरान मुगल शासक यहां अक्सर ठहरा करते है। इसके बाद गर्मी के दिनों अंग्रेज शासक इसी महल में ठहरा करते थे। महल के साथ तालाब, फाउंटेन और 'दीवान ए आम' और 'दीवान ए खास' का अस्तित्व आज भी मौजूद है। लगभग डेढ़ मीटर गोलाकार 25 फाउंटेन का अस्तित्व साफ दिखाई देता है। महल के साथ उस जमाने का एक कुआं भी है। हालांकि अब उसमें पानी नहीं है और चबूतरे भी काफी हद तक टूट चुके हैं। महल से सटा हाथी खाना है, जो लाल ईंटों से बना है।

कैसे मिले पहचान
मुगल कालीन इस ऐतिहासिक इमारत की देखभाल का काम भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के जिम्मे है, जबकि गार्ड की मेंटनेंस दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के पास। पार्क का एक हिस्सा बेहद खूबसूरत है, लेकिन बाकी हिस्सा थोड़ा वीरान।

गार्डन से सटा शालामार गांव है। यहां के 75 वर्षीय निवासी हरि राम सैनी कहते हैं, 'सरकार यदि इस ऐतिहासिक स्थल पर ध्यान दे, तो जल्दी ही यह गार्डन दिल्ली के बड़े पिकनिक स्पॉट शामिल हो सकता है। हालांकि इसकी कोशिश तो होती है, लेकिन अंजाम कुछ नहीं निकलता। समझ में नहीं आता कि आखिर किस वजह से काम बीच में ही छोड़ दिया जाता है।'

इसी इलाके के निवासी राजू चौहान का कहना है कि वैसे तो ऐतिहासिक महल तक पहुंचने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन अच्छा रास्ता, बेहतर साधन और गार्डन व महल से जुड़ी इतिहास की जानकारी वहां उपलब्ध करवाई जाए, तो यह एक अच्छा टूरिस्ट स्पॉट बन सकता है। राजू कहते हैं, 'मेट्रो स्टेशन से करीब होने के कारण टूरिस्टों के लिए यह एक बेहतर स्पॉट बन सकता है, जरूरत इस बात की है कि इस बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी दी जाए। मेट्रो स्टेशनों पर इसके बारे में जानकारी मुहैया करवाई जाए, क्योंकि इसी वजह से यह इतने सालों से गुमनाम है।'

कैसे पहुंचें
शीशमहल तक पहुंचने के लिए कई तरीके हैं। अपनी गाड़ी के अलावा ट्रेन, मेट्रो और बस से भी आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है। मेट्रो से जाने के लिए जहांगीरपुरी या फिर आदर्श नगर मेट्रो स्टेशन नजदीक है। सुभाष नगर मेट्रो स्टेशन से भी आया जा सकता है। ट्रेन से जाने के लिए आजादपुर रेलवे स्टेशन नजदीक है। कनॉट प्लेस, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और कश्मीरी आईएसबीटी से बस भी जाया जा सकता है।

यह जीटी रोड पर न्यू फ्रूट मंडी, आजादपुर इलाके में स्थित है। आने वाले समय में यहां पहुंचना और आसान हो जाएगा, क्योंकि जीटी रोड व शालीमारबाग को जोड़ने वाली सड़क पर रेलवे का अंडर पास बनाया जा रहा है, जो अगले तीन महीने में तैयार हो सकता है।

कब जाएं
गार्डन और शीश महल में सुबह 6 बजे से शाम पांच बजे के दौरान जाना ठीक रहेगा। शाम ढलने के बाद गार्डन में जाना ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि यहां लाइट की अच्छी व्यवस्था नहीं है। 

कोट्टायम जाना है

कोट्टायम जाने का यह टाइम अच्छा है , लेकिन वहां हल्की ठंड होगी। इसलिए अपने साथ स्वेटर व शॉल जरूर लेकर चलें। ठहरने के लिए स्टैंडर्ड व बजट दोनों तरह के ऑप्शंस आपको वहां मिलेंगे। हालांकि लग्जरी हाउस बोट्स के बारे में भी सोचा जा सकता है। यहां के खूबसूरत नजारों के बीच आप कुछ दिन किसी रिसोर्ट में रहने का मजा जरूर लें। इसके अलावा , एडवेंचर व नेचर से जुड़ने के लिए पेरियार वाइल्डलाइफ सेंचुरी जा सकते हैं। यह जगह हाथियों , चीतों और खास तरह के भैंसों के लिए मशहूर है। कोट्टायम का तिरुंकारा शिव टेंपल भी एक देखने लायक जगह है। वैसे , मार्च में यहां होने वाले फाल्गुन उत्सव का पर्यटकों में खासा क्रेज रहता है। इस दौरान यहां संस्कृत में नाटक खेले जाते हैं , जिनकी गहराई जानने के लिए लोकल लोगों के साथ टूरिस्टों का भी खूब जमावड़ा रहता है। कोट्टायम के पास कुमारकोम भी एक आकर्षक जगह है , जो प्रवासी पक्षियों के लिए मशहूर है। कोट्टायम से नजदीकी एयरपोर्ट कोच्चि का है , जहां से इसकी दूरी 80 किमी है। वैसे , यह रेल मार्ग से तमाम शहरों से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा , यहां पहुंचने के लिए बोट व फेरी भी ली जा सकती हैं। 

रेत का सुनहरा सौंदर्य : जैसलमेर

अपनी शानदार नक्काशीदार हवेलियों , गलियों और प्राचीन मंदिरों की वजह से जैसलमेर पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। अगर आप असली राजस्थान का अहसास करना चाहते हैं , तो यहां जरूर जाइए :

देश के सबसे गर्म शहरों में से एक जैसलमेर राजस्थान के पश्चिमी छोर पर थार मरुस्थल में बसा है। रेतीली जमीन पर बसा होने की वजह से जैसलमेर को पहले ' मेर ' के नाम से जाना जाता था। क्षेत्रफल के आधार पर यह देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान का सबसे बड़ा जिला है। इसे ' राजस्थान के अंडमान ' के अलावा ' हवेलियों और झरोखों की नगरी ' भी कहा जाता है। 1156 में यहां के राजपूत राव जैसल ने जैसलमेर को अपनी राजधानी बनाया और यहां 12 साल तक शासन किया। बाद में , यह राव जेसल के नाम पर ही इस शहर का नाम जैसलमेर हो गया। मध्यकाल में जैसलमेर व्यापार करने वालों का मुख्य पड़ाव हुआ करता था। यह ईरान , अरब , अफ्रीका और मिस्र से व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था।

सोनार का किला 

 त्रिकुटा पहाड़ी पर बने इस विशाल किले को राव जैसल ने 1156 में बनवाया था। पीले बलुआ पत्थरों से बना यह किला देखने में संतरे के रंग का लगता है। यह किला सूरज की रोशनी में सोने की तरह चमकता है , इसलिए इसका नाम सोनार का किला पड़ा। किले में 99 बुर्ज हैं और 4 दरवाजे हैं। यही नहीं , किले के परकोटे में पूरा शहर समाया हुआ है। जैसलमेर किला दुनिया का अकेला ऐसा किला है , जहां शहर के एक चौथाई लोग रहते हैं। इस किले में पूरा का पूरा शहर है। साइबर कैफे से लेकर रेस्तरां तक।

हालांकि किसी जमाने में पूरा जैसलमेर शहर की इस किले के भीतर बसा हुआ था। इस किले में कई संकरी गलियां हैं , जिनमें कई नक्काशी वाली हवेलियां हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसकी पीले पत्थरों से बनी दीवारें दिन में चमकीले - पीले भूरे रंग की दिखाई देती हैं और शाम ढलते ही इनका रंग सुनहरा हो जाता है। इसीलिए इसे सुनहरा किला कहा जाता है। आपको बता दें कि महान फिल्मकार सत्यजीत रे का जासूसी उपन्यास ' सोनार किला ' इसी किले की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। यहां जाने पर डेजर्ट लाइट शो मिस न करें।

सैम सैंड ड्यूंस
रेत के टीले देखे बगैर जैसलमेर की यात्रा अधूरी है। जैसलमेर से 42 किमी की दूरी पर सैम सैंड ड्यूंस यानी बालू के टीले स्थित हैं। रेत के टीलों का यह अथाह सागर राजस्थान का असल अहसास कराता है। यहां से सनसेट देखना न भूलिए। और यहां पर रेत के मैदान में ऊंट की सवारी करने का भी अलग ही मजा है। यहां कई कल्चरल प्रोग्राम भी होते रहते हैं। टेंट में रात गुजारकर ऐसे प्रोग्राम देखना एक अनूठा एक्सपीरियंस होगा।

पटवों की हवेली
जैसलमेर के अमीर व्यापारियों ने यहां महल जैसी हवेलियां बनवाई थीं। ये हवेलियां करीब 300 साल पुरानी हैं। इन हवेलियां में सबसे भव्य पटवों की हवेली है। 1805 में बनी यह हवेली 7 छोटी हवेलियों का समूह है।

सालिम सिंह की हवेली
महाराजा रावल गज सिंह के प्रधानमंत्री सालिम सिंह की बनवाई गई इस हवेली में अलग - अलग डिजाइन के 38 छज्जे हैं। इसमें मोर के आकार के बारीक नक्काशीदार कई प्रकोष्ठ बने हुए हैं। इन हवेलियांे को देखने विदेशी पर्यटक भी खूब आते हैं।

गड़सीसर झील
यह झील जैसलमेर के दक्षिणी इलाके में है , जो कभी शहर का प्रवेश द्वार हुआ करती थी। इसे रावल गड़सी सिंह ने 1340 में बनवाया था। 1965 से पहले यह जैसलमेर वासियों का प्रमुख पेयजल स्रोत भी था।

बड़ा बाग
अपने नाम के हिसाब से ही यह अपने समय का सबसे बड़ा बाग था। इस बाग में यहां के शासकों ने अपने पूर्वजों की याद में स्मारक बनवाए थे। ये स्मारक छतरी कहे जाते हैं। इनमें सबसे पुरानी महाराजा जैत सिंह की छतरी है।

डेजर्ट नैशनल पार्क
3,162 किमी के एरिया में फैला यह राजस्थान का सबसे बड़ा नैशनल पार्क है। इसे देखने के लिए समय जरूर निकालें।

जैन मंदिर
यहां के जैन मंदिर काफी खूबसूरत बने हुए हैं। इनमें भगवान पार्श्वनाथ का मंदिर अपनी स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है। गुजराती शैली के इस मंदिर में करीब 1253 मूर्तियां हैं। यहां के शीतलनाथ भगवान के मंदिर में सुंदर पत्थरों की पच्चीकारी है। वहीं 15 वीं शताब्दी में बना भगवान ऋषभदेव का मंदिर भी अद्भुत है। यहां का शांतिनाथ भगवान का मंदिर भी अपनी खूबसूरत कलाकारी के लिए बेहद प्रसिद्ध है।

कैसे जाएं
जैसलमेर का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट जोधपुर है। दोनों शहरों की दूरी करीब 285 किमी है। जोधपुर एयरपोर्ट देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। जोधपुर से यहां जाने के लिए टैक्सी या बस ले सकते हैं। दिल्ली से यहां जाने के लिए सीधी ट्रेन है। हां , अगर लग्जरी के शौकीन हैं , तो पैलेस ऑन व्हीलस की सवारी भी कर सकते हैं।
कब जाएं
जैसलमेर जाने के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय बेहतर है। हालांकि एडवेंचरस टूरिस्ट यहां साल भर घूमते रहते हैं।

क्या खरीदें
यहां से राजस्थानी मिरर वर्क एम्ब्रॉयडरी , वुडन बॉक्स और सिल्वर जूलरी जरूर खरीदें। हाथ से बुने ब्लैंकेट और यहां के ट्रडिशनल कालीन भी खास हैं। एंटीक और ओल्ड स्टोनवर्क का सामान भी आपका मन लुभाएंगे। यहां के सदर बाजार , खादी ग्रामोद्योग एंपोरियम , राजस्थानी गवर्नमेंट शॉप , पंसारी बाजार , मानक चौक और गांधी दर्शन से खरीदारी कर सकते हैं। 

भलस्वा लेक: वेस्ट का बेस्ट प्लेस

भलस्वा झील राजधानी के प्रमुख पिकनिक स्पॉट्स में से एक है। यहां घूमने-फिरने वालों के अलावा बोटिंग और तैराकी सीखने वाले भी खूब आते हैं। उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में स्थित इस स्पॉट पर ऐसी कई चीजें हैं, जो पर्यटकों को खासा लुभाती हैं :
वेस्ट दिल्ली की तरफ अगर आप आउटिंग के लिए बढि़या जगह तलाश रहे हैं, तो भलस्वा लेक आपके लिए बेहतरीन ऑप्शन हो सकती है। यहां आप नेचर के साथ वक्त बिताने के अलावा और भी बहुत कुछ एंजॉय कर सकते हैं।
क्या है यहां
सैकड़ों एकड़ में फैली इस झील के एक तरफ गोल्फ कोर्स और पार्क है, जबकि दूसरी ओर आउटर रिंग रोड और कॉलोनी व गांव बसे हुए हैं। इसलिए यह पूरा इलाका बेहद शांत है। वैसे तो पिछले कुछ सालों में यहां कम पानी होता था, लेकिन इस बार भारी बारिश की वजह से झील में खूब पानी है। यकीनन झील फिलहाल बेहद खूबसूरत नजर आ रही है। अब यहां जहां तक नजर जाती है, बहता पानी और हरियाली नजरों को कहीं ओर भटकने ही नहीं देते। वैसे, यहां दिन भर बोटिंग और तैराकी करने वालों का आना-जाना लगा रहता है। यहां की व्यवस्था दिल्ली टूरिजम के पास है और विभाग के अधिकारी सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक यहां मौजूद रहते हैं।
बोटिंग का मजा
अगर बोटिंग एंजॉय करना चाहते हैं, तो यहां 24 से भी ज्यादा छोटी-बड़ी बोट्स हैं। एक मोटर बोट है, जिससे एक साथ पूरी झील की सैर की जा सकती है। इसके अलावा, यहां पेडल बोट्स और साधारण बोट्स भी पर्याप्त संख्या में है। पर्यटकों की सुरक्षा के लिए दिल्ली टूरिजम की ओर से लाइफ गार्ड और अन्य कर्मचारी भी मौजूद रहते हैं। तैराकी और बोटिंग की ट्रेनिंग देने के लिए यहां बीएसएफ के जवान आते हैं। इसके अलावा, प्राइवेट कोच की सुविधा भी है। प्राइवेट कोच विनोद शर्मा बताते हैं, 'इस बार बोटिंग और तैराकी के लिए झील में पर्याप्त पानी है। इस वजह से यहां पिछले सालों के मुकाबले अधिक स्टूडेंट्स ट्रेनिंग लेने के लिए आ रहे हैं।' 

 एंजॉय करें पिकनिक
भलस्वा झील को राजधानी के बड़े पिकनिक स्पॉट्स में शुमार किया जाता है। यही वजह है कि राजधानी के दूसरे इलाकों से भी लोग यहां पिकनिक एंजॉय करने आते हैं। दरअसल, यहां का शांत व हरा-भरा माहौल सभी को खासा लुभाता है। झील का आकर्षण भी कम नहीं है और यहां मछलियों की बड़ी वैराइटी देखने को मिलती हैं। इतना ही नहीं, यहां साइबेरियन पक्षी भी आते हैं। झील के पास रहने वाले रामफल सिंघल का कहना है, 'अगर सरकार पूरी ईमानदारी से झील के विकास पर ध्यान दे, तो यह राजधानी का सबसे बड़ा पिकनिक स्पॉट बन सकता है। इससे लोगों का मनोरंजन तो होगा ही, बल्कि सरकार को राजस्व की प्राप्ति भी होगी। हालांकि अगर सरकार खुद सुविधाएं नहीं बढ़ा पा रही है, तो इसे किसी प्राइवेट कंपनी दे देना चाहिए। इस तरह यहां आने वाले पर्यटकों को अधिक से अधिक सुविधा मिल सकेगी।'
करियर का स्कोप
झील पर लोग एडवेंचर व मस्ती के अलावा करियर बनाने के लिए भी आते हैं। दरअसल , इस झील पर तैराकी और बोटिंग सीखने के बाद कई लोग न सिर्फ नैशनल चैंपियनशिप में शामिल हुए , बल्कि उन्हें खासी सफलता भी मिली। भलस्वा गांव के निवासी नयन सिंह यादव कहते हैं , ' झील ने मुझे बहुत कुछ दिया। यहां की ट्रेनिंग ने मुझे नैशनल लेवल का खिलाड़ी बना दिया। इसका लाभ यह हुआ कि मुझे बीएसएफ में नौकरी मिल गई। अभी मैं वहां हेड कांस्टेबल के पद पर तैनात हूं। वैसे , मौका लगने पर मैं अक्सर यहां आता रहता हंू और यहां आने वाले बच्चों व अन्य लोगों को बोटिंग व इसकी तैयारी के बारे में बताता हूं। '
स्टूडेंट्स की मस्ती
राम किशन यादव सोनिया विहार स्थित सरकारी स्कूल में 10 वीं क्लास के स्टूडेंट हैं और वह झील पर बोटिंग व तैराकी की ट्रेनिंग ले रहे हैं। उन्होंने बताया , ' बीएसएफ के कोच के अलावा प्राइवेट कोच भी यहां ट्रेनिंग देते हैं और कई स्टूडेंट्स इसमंे दिलचस्पी रखते हैं। ' राम किशन पढ़ाई के बाद झील पर आ जाते हैं और फिर अपनी ट्रेनिंग लेते हैं। रामकिशन के साथी सुशील भी उनके साथ आते हैं। उनका कहना है कि वह इसी फील्ड में अपना करियर बनाना चाहते हैं और इसी वजह से वह यह ट्रेनिंग ले रहे हैं।
ट्रेनिंग फीस
तैयारी और बोटिंग की मामूली फीस है। यदि कोई आर्थिक रूप से कमजोर है , तो उसे भी मदद की जाती है। भलस्वा बोट क्लब का मेंबर बनकर कोई भी व्यक्ति यहां अच्छे कोच से ट्रेनिंग ले सकता है। जूनियर लेवल की ट्रेनिंग के लिए मेंबर बनने पर पहली बार 125 रुपये देने होंगे और इसके बाद हर महीने 75 रुपये की फीस लगेगी। 18 साल से ज्यादा उम्र वालों के लिए पहली बार 175 रुपये और इसके बाद 100 रुपये महीने की फीस है।
बोटिंग चार्ज
पर्यटकों के लिए पेडल और मोटर बोट्स उपलब्ध हैं। पेडल बोट के लिए 50 रुपये चार्ज देना पड़ता है। 50 रुपये में 4 लोग आधे घंटे तक बोटिंग का मजा ले सकते हैं। 30 मिनट से अधिक समय होने पर 50 रुपये अतिरिक्त देने पड़ेंगे। मोटर बोट पर एक साथ 6 लोगों के बैठने की व्यवस्था है और इसका चार्ज 150 रुपये है। दिल्ली पर्यटन विभाग का दावा है कि किसी तरह की अनहोनी से बचाने के लिए झील में लाइफ गार्ड हर समय मौजूद होते हैं।
कहां है झील
यह झील उत्तर - पूर्वी इलाके में स्थित है और यह जहांगीरपुरी व भलस्वा गांव के पास है। जीटी रोड और आउटर रिंग रोड से बेहद करीब यह झील दूर से ही नजर आती है। वैसे , यह जहांगीर पुरी थाने के ठीक पीछे है।
कैसे पहुंचे
आप चाहें अपने वीकल से जाएं या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट यूज करें , यहां पहुंचना बेहद आसान है और इसमें आपको कोई परेशानी नहीं होगी। वैसे , यहां मेट्रो से भी पहुंच सकते हैं। मेट्रो रेल से जाने के लिए जहांगीरपुरी मेट्रो स्टेशन पर उतरना चाहिए। यहां से बस या ऑटो मिल जाता है। आप रिक्शा से भी ले सकते हैं। इसके लिए पहले आप को भलस्वा गांव ( आउटर रिंग रोड चौराहा ) जाना पड़ेगा। बस की सुविधा काफी अच्छी है। यहां से बस रूट नंबर 165, 254, आउटर मुद्रिका आदि बसें मिलती हैं।
सुरक्षा का ध्यान
झील के आसपास पुलिस गश्त होती है। दिल्ली पुलिस की ओर से इलाके में सुरक्षा की व्यवस्था है। लेकिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक के बीच ही वहां रहना बेहतर है। इसके बाद रिस्क हो सकता है। वहां कोई कीमती सामान लेकर नहीं जाएं। झील में बोटिंग करते समय जरूरी गाइडलाइंस का पालन करें। बोट पर बैठते समय इस बात को नजरअंदाज नहीं करें कि बोट से से छेड़छाड़ करना खतरनाक हो सकता है। वैसे , लेक पर बंदर भी काफी हैं। इन्हें कुछ खिलाने या उकसाने की कोशिश न करें , क्योंकि यह खतरनाक हो सकता है। 

गुफा मंदिर ईस्ट दिल्ली की शान

ईस्ट दिल्ली के गुफा मंदिर में इन दिनों नवरात्र की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं। इस मौके पर यह मंदिर खासतौर से भक्तों को खासा अट्रैक्ट करता है। आइए इस मंदिर के बारे में देते हैं आपको कुछ खास जानकारी :

नवरात्र में सभी मंदिर दुलहन की तरह सज जाते हैं। इस मौके पर प्रीत विहार स्थित गुफा शिव मंदिर की बात ही अलग होती है। वैसे, यह भक्तों के बीच गुफावाला मंदिर के नाम से फेमस है और नवरात्र के समय यहां पर दूर-दूर से भक्त आते हैं।

ऐसे बना
यह मंदिर 1987 में बनना शुरू हुआ और 1994 में बनकर तैयार हो पाया। शुरुआत में इस मंदिर में दो- तीन ही मूर्तियां थी, लेकिन अब इनकी संख्या अच्छी खासी बढ़ गई है। मंदिर में सफेद व काले रंग का संगमरमर लगाया गया है। मंदिर में नीचे की तरफ जाने के लिए घुमावदार फ्लाईओवर व सीढ़ियां बनाई गई हैं, जो मंदिर की खूबसूरती बढ़ा देती हैं। 


आकर्षक डिजाइन
यह मंदिर वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर बना है। मंदिर की छत पर सुंदर कलाकारी की गई है और मंदिर के बाहरी हिस्से में सुंदर मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों में श्रीकृष्ण गाय के सामने खड़े होकर बांसुरी बजा रहे हैं। यहां पर शिव की प्रतिभा भी खासी आकर्षक है। इसके अलावा दीवारों पर सुंदर नक्काशी भी काफी अट्रैक्ट करती है।

खूबसूरत मूर्तियां
इस मंदिर की मूर्तियां आपको रोड से ही नजर आ जाएंगी। मंदिर में शेरा वाली माता की बड़ी मूर्ति है, जो बहुत ही खूबसूरत है। शंकर भगवान, पार्वती और बाल गणेश की मूर्ति के साथ ही लक्ष्मी, सरस्वती और गौरी देवी की भी यहां पर बहुत बड़ी मूर्तियां हैं। वहीं शेषनाग के ऊपर लेटे भगवान विष्णु की मूर्ति भी खासी अट्रैक्टिव है। मंदिर के बाहरी हिस्से में गणेश और हनुमान की 30 फुट ऊंची मूर्ति बनी है। गणेश की मूर्ति के पास ही लड्डू खाते चूहे की भी मूर्ति है, जो बच्चों के बीच काफी पॉपुलर है। इसके अलावा, भगवान शिव की बड़ी-सी मूर्ति है, जिसके सिर से पानी निकल रहा है।

शानदार गुफा
इस मंदिर के अंदर शानदार गुफा बनी हुई है, जिसके द्वार पर शेर का मुंह बना हुआ है। यह गुफा 200 मीटर लंबी, 5 फुट चौड़ी और 8 फुट ऊंची है। यह घुमावदार गुफा है। गुफा में प्रवेश करते ही आपको लगेगा जैसे आप वैष्णो देवी मंदिर पहुंच गए हैं। आप जब सीढ़ियों से ऊपर जाएंगे, तो आपको देवी के तीनों पिंडों के दर्शन होंगे। गुफा से बाहर आते हुए आप भैरों बाबा के दर्शन भी कर सकते हैं।

आस्था और विश्वास
इस मंदिर में दर्शन करने आने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है। आसपास ही नहीं , बल्कि दूर - दराज के लोगों के बीच भी यह मंदिर खूब पॉपुलर है। माना जाता है कि यहां पर पेड़ पर चुनरी बांधने से मन मुताबिक इच्छा पूरी हो जाती है। इसलिए चुनरी बांधने वालों का यहां पर अच्छा खासा हुजूम देखा जा सकता है।

सुरक्षा के खास इंतजाम
मंदिर में सुरक्षा के भी खासे इंतजाम है। गेट पर चेकिंग के बाद ही आप मंदिर में एंट्री कर सकते है। यहां पर दर्शन करने के लिए आने वाले लोगों के जूते चप्पल रखने के लिए एक अलग से स्टॉल भी बना हुआ है। पीने के साफ जल के साथ ही यहां पर पार्किंग की भी सुविधा है। मंदिर के अंदर खाने पीने का कोई स्टॉल नहीं है , हां बाहर खाने के बहुत से ऑप्शन मौजूद हैं। मंदिर के पास ही हार्ड वर्ड अकेडमी , मदर टेरसा और प्रीत पब्लिक जैसे स्कूल भी हैं। अगर आप दर्शन के बाद शॉपिंग और मूवी देखने की प्लानिंग कर रहे है , तो मंदिर से थोड़ी ही दूर पर वी 3 एस मॉल भी घूमने का लुत्फ उठा सकते हैं।

कल्चरल ऐक्टिविटीज
इस मंदिर में समय - समय पर कल्चरल कार्यक्रम भी होते रहते है। नवरात्र के दिन मंदिर के पास खाली ग्राउंड में रामलीला का आयोजन किया जाता है। यहां पर खाने - पीने के आइटम के साथ ही बच्चों के लिए झूले भी लगाएं जाते हैं। दशहरे के दिन यहां पर रावण , कुंभकरण , और मेघनाथ के पुतले जलाएं जाते है और शिवरात्रि और कृष्ण अष्टमी के दिन रंग बिरंगी झांकियां निकाली जाती हैं।

जब जाना हो मंदिर
आप प्रीत विहार स्थित गुफा मंदिर में मेट्रो से जा सकते हैं। आप जब प्रीत विहार मेट्रो स्टेशन उतरेंगे , तो वहां से आपको कुछ दूर तक पैदल चलना पड़ेगा। वैसे आप हसनपुर डिपो उतरकर भी मंदिर पहुंच सकते हैं। अगर आप सीधा मंदिर के सामने उतरना चाहते हैं , तो आप ऑटो से पहुंच सकते हैं।

अहमदाबाद में आएगा नवरात्र का मजा

गर आप नवरात्र में कल्चरल इवेंट्स का लुत्फ उठाना चाहते हैं, तो इसके लिए देश में अहमदाबाद से बेहतर कोई जगह नहीं है। आजकल पूरा अहमदाबाद नवरात्र के रंग में डूबा हुआ है। वहां आपको छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक हर कोई पूरी रात गरबा व डांडियां खेलता मिल जाएगा। उन पर नवरात्र का इतना ज्यादा सुरूर होता है कि हर कोई बिना रुके गरबे की थाप पर झूमता रहता है। वैसे तो नवरात्र में पूरे अहमदाबाद में तमाम कल्चरल इवेंट होते हैं, लेकिन यहां की सबसे बड़ी खासियत इस दौरान होने वाला दुनिया का सबसे बड़ा डांस फेस्टिवल 'स्वर्णिम नवरात्र' है। इसे देखने के लिए देश से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं।

रोजाना हजारों लोगों की मौजूदगी का गवाह बनने वाला यह इवेंट 8 से 16 अक्टूबर तक जीएमडी ग्राउंड, मेमनागढ़ में हो चल रहा है। फेस्टिवल की शुरुआत 300 आर्टिस्टों की बेहतरीन परफॉर्मेंस से हुई। नवरात्र के मौके पर देश की एकता भी खूब दिखी। खासतौर पर राजस्थान, बंगाल, महाराष्ट व पंजाब से यहां आकर सेटल हो गए लोगों ने अपनी परफॉर्मेंस से सबका मन मोह लिया। इंजॉय के मामले में देसी के विदेशी कपल भी पीछे नहीं थे। एक विदेशी कपल ने 40 हजार दर्शकों के सामने गरबा करके सबका दिल जीत लिया। फेस्टिवल में मां दुर्गा के नौ रूपों पर आधारित डांस भी दिखाया गया। इसमें मां लक्ष्मी, मां सरस्वती व मां काली के रूपों को डांस के जरिए पेश किया। यहां फेमस मनियारो रास और दीविड़ा गरबा को एक साथ कई सौ आटिस्टों ने पेश किया। वहीं थीम पविलियन में पूरे गुजरात के अलग-अलग हिस्सों को बेहद खूबसूरत झांकी में पेश किया।

इसके अलावा, नवरात्र के मौके पूरे अहमदाबाद में हर जगह कल्चरल इवेंट ऑर्गेनाइज किए जाते हैं, जहां बच्चे से लेकर बड़े तक गरबा व डांडिया करते हैं। यहां नवरात्र पर गरबा करने के लिए कई महीने पहले ही लोग उसकी प्रैक्टिस करने लगते हैं। इसके अलावा गरबा व डांडिया में बाकायदा पूरा ट्रडिशनल ड्रेस पहनकर डांस करते हैं। यही वजह है कि नवरात्र से कुछ दिन पहले ही पूरे अहमदाबाद की सड़कों पर चनिया-चोली से लेकर ट्रडिशनल जूलरी तक बिकने लगती है। इस फेस्टिवल में आप कल्चरल इवेंट, थीम पविलियन, गरबा कॉम्पिटीशन, टूरिज्म पविलियन, फूड कोर्ट, क्राफ्ट बाजार, खादी हाट, एडवेंचर्स स्पोर्ट्स व किड्स सिटी वगैरह देख सकते हैं। 

काठमांडू में क्या देखें

काठमांडू शहर में आपको काफी कुछ दिलचस्प मिलेगा। वहां जाने के लिए कई एयरलाइंस ऑपरेट कर रही हैं , तो आप वीजा भी वहां पहुंच कर ले सकते हैं। हालांकि साथ में आपको अपनी फोटोग्राफ व दूसरे जरूरी डॉक्युमेंट्स रखने होंगे। आगे जाने के लिए आप बस या टैक्सी ले सकते हैं। काठमांडू में आप स्वयंभू , बौद्ध स्तूप , नारायणहिती पैलेस म्यूजियम , पशुपतिनाथ मंदिर , गार्डन ऑफ ड्रीम्स , नासल चौक , थेमल चौक वगैरह जरूर जाएं। काठमांडू दरबार स्क्वेयर यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल है और यहां का म्यूजियम भी दर्शनीय है।

इसके अलावा , आप कई और मंदिर व इमारतें यहां देख सकते हैं। हालांकि यहां आपको कोई एडवेंचर एक्टिविटी नहीं मिलेगी , लेकिन यहां से ट्रैकिंग , राफ्टिंग , जंगल एडवेंचर वगैरह की शुरुआत होती है। अगर आप अक्टूबर या नवंबर की प्लानिंग कर रहे हैं , तो तीहर ( दीवाली जैसा त्योहार ) या हिमालयन ब्लूज फेस्टिवल ( एक म्यूजिक फेस्टिवल ) के अनुसार प्लानिंग कर सकते हैं। अगर शॉपिंग करना चाहें , तो यहां से चांदी की चीजें , कपड़े , कार्पेट , पशमीना , इलेक्ट्रॉनिक आइटम वगैरह ले सकते हैं। 

दार्जिलिंग: चाय की खुशबू के बीच सैर

चाय के बागानों के लिए मशहूर दार्जिलिंग हिमालय की पहाड़ियों के मोहक नजारे दिखाता है। यहां मंदिरों व मठों के जरिए अध्यात्म का संदेश गूंजता है, तो ट्रेकिंग के लिए भी यह बेस्ट जगह है। फिर टॉय ट्रेन का रोमांच भी है। यानी हर एज ग्रुप के लिए यहां कुछ न कुछ खास जरूर है :

किसी हिल स्टेशन पर घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो दार्जिलिंग के बारे में सोचें। वेस्ट बंगाल का यह पहाड़ी शहर हिमालय की वादियों का खूबसूरत नजारा दिखाता है और सूरज के आने व छिपने के नजारे तो आपको बस अपने मोहपाश में जकड़ लेते हैं।

वैसे, यह जगह सिर्फ घूमने के लिए ही फेमस नहीं है, बल्कि यहां आकर आपको कई ऐसी चीजें सीखने और देखने को मिलेंगी, जिसकी कल्पना आपने शायद ही की हो। सबसे ऊंची जगह का स्टेशन होने का गौरव कर्सियांग को हासिल है। इस स्टेशन परिसर का आनंद उठाने के बाद आप खरीदारी भी कर सकते हैं।

  इसके बाद आता है घूम। यहां एक गोल चक्कर-सा बना है, जिसके चारों ओर रेल की पटरियां बिछाई गई हैं। बीच में एक लंबा सा खंभा है और परिसर में हरियाली है। यहां गोल चक्कर के चारों ओर खाई ही खाई दिखेगी। हालांकि यहां जाने के लिए प्रवेश शुल्क लिया जाता है, लेकिन टॉय ट्रेन से जाने पर शुल्क नहीं देना होगा। यहां फोटोग्राफी का एक अलग आनंद मिलेगा। इसके बाद शुरू होती है दार्जिलिंग की चढ़ाई। इस बीच रास्ते में मोमोज आपको कई जगह बिकते दिखेंगे। ऊंचाई बढ़ने के साथ ही रोमांच भी बढ़ता जाएगा और आपको चाय के बागान भी दिखने लगेंगे।

अगर आप ट्रेन से पूरे दार्जिलिंग नहीं घूमना चाहते हैं, तो आप इस ट्रेन से दार्जिलिंग स्टेशन से घूम मठ तक जा सकते हैं। हालांकि ट्रेन से आप या तो बहुत सुबह जाएं या फिर देर शाम को। क्योंकि बाकी समय यहां काफी भीड़ मिलेगी। दार्जिलिंग पहुंचने के बाद आता है मैल। इस स्पॉट पर आप घुड़सवारी का लुत्फ उठा सकते हैं, तो यहां का जू भी पॉपुलर है। अगर लकी रहे, तो बर्फीले तेंदुए, लाल पांडा, साइबेरियन बाघ और तिब्बतन भेडि़या जैसे जानवर देख पाएंगे।

इससे ऊपर चलने पर भगवान शिव का महाकाल मंदिर है। साथ ही बौद्ध मठ भी है। यहां आकर मन एक अद्भुत शांति महसूस करता है। यहां से आपको नेपाल का बॉर्डर दिखता है, तो थोड़े नजारे सिक्किम के भी नजर आ जाएंगे।

मुख्य आकर्षण
यह शहर पहाड़ की चोटी पर स्थित है और यहां बिछे सड़कों के जाल पर घूमते हुए आपको औपनिवेशिक काल की बनी कई इमारतें दिख जाएंगी। ये इमारतें आज भी काफी आकर्षक लगती हैं। इन इमारतों में लगी पुरानी खिड़कियां और धुएं निकालने के लिए बनी चिमनी पुराने समय की यादें ताजा कर देंगी।

शक्य मठ
यह मठ दार्जिलिंग से 8 किलोमीटर दूर स्थित है। शाक्य मठ शाक्य संप्रदाय का ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण मठ है। इसकी स्थापना 1915 में की गई थी। इसमें एक विशाल प्रार्थना कक्ष भी है।

माकडोग मठ
यह मठ चौरास्ता से 3 किलोमीटर की दूरी पर आलूबरी गांव में स्थित है। यह बौद्ध धर्म के योलमोवा संप्रदाय से संबंधित है और इसकी स्थापना श्री संगे लामा ने की थी। बता दें कि यह एक छोटा सा संप्रदाय है , जो नेपाल के पूर्वोत्तर भाग से दार्जिलिंग में आकर बस गया।

जापानी मंदिर
विश्व में शांति लाने के लिए इस स्तूप की स्थापना महात्मा गांधी के मित्रों में से एक फूजी गुरु ने की थी। वैसे , भारत में ऐसे कुल 6 शांति स्तूप हैं। इस मंदिर का निर्माण कार्य 1972 में शुरू हुआ था और 1 नवंबर 1992 को इसे आम लोगों के लिए खोला गया। इस मंदिर से पूरे दार्जिलिंग और कंचन जंघा का खूबसूरत नजारा दिखता है।

टाइगर हिल
टाइगर हिल पर चढ़ाई करने का अपना मजा है। इसी के पास कंचन जंघा चोटी है। 1838 से 1849 ई . तक इसे ही विश्व की सबसे ऊंची चोटी माना जाता था। वैसे , अगर आप लकी रहे , तो यहां से आपको कंचन जंघा और माउंट एवरेस्ट , दोनों का नजारा दिखेगा। इन दोनों चोटियों की ऊंचाई में मात्र 827 फीट का अंतर है। यहां की एक खासियत यहां का सन राइज है।

कहां ठहरें
दार्जिलिंग में ठहरने की अच्छी व्यवस्था है , क्योंकि यहां कई होटल हैं। हालांकि इनमें से कोई फाइव स्टार नहीं है। वैसे , यहां बजट होटलों की संख्या काफी है , तो यहां कई लॉज भी हैं। यहां खाना पीना भी आमतौर पर सस्ता ही है। लेकिन खास प्रकार के व्यंजन की मांग करने पर उसका रेट हाई हो सकता है। इसके अलावा , टी गार्डन में गेस्ट हाउस भी है , जहां रुकने के लिए आपको एडवांस बुकिंग करवानी होगी।

कैसे जाएं
दार्जिलिंग देश के प्रमुख हिस्सों से हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है। बागडोगरा ( सिलीगुड़ी ) यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है। यहां से कोलकाता , गोहाटी और दिल्ली लिए रेग्युलर फ्लाइट्स हैं। अगर ट्रेन से जाना चाहते हैं , तो नजदीकी स्टेशन न्यू जलपाइगुड़ी है। कोलकता से दार्जिलिंग मेल और कामरूप एक्सप्रेस न्यू जलपाइगुड़ी जाती है। दिल्ली से गुवाहाटी राजधानी एक्सप्रेस यहां तक आती है। इसके अलावा , टॉय ट्रेन से न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग 8-9 घंटे में जाया जा सकता है। वैसे , यह सिलीगुड़ी से सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है और यह दूरी चार घंटे में पूरी की जा सकती है।

कब जाएं
दार्जिलिंग जाने का बेस्ट टाइम मार्च से मई और सितंबर से नवंबर के बीच है। मई के बाद जहां यहां काफी बारिश रहती है , वहीं सर्दियों में टेम्परेचर बहुत कम हो जाता है।

क्या करें
आप यहां ट्रेकिंग का भरपूर मजा ले सकते हैं , तो पक्षियों व पौधों को जानने के लिए भी यह एक बेहतरीन जगह है।

क्या खरीदें
वूलन और गर्म कपड़ों के अलावा आप तिब्बती कार्पेट , लकड़ी व लेदर की चीजें वगैरह ले सकते हैं। 

सिंगापुर में किन बातों का ध्यान रखें

सिंगापुर काफी सेफ जगह है और अकेली महिलाएं तक देर रात तक बाहर घूम सकती हैं। लेकिन भीड़भाड़ वाली जगहों पर आपको जेबकतरों से सावधान रहना होगा। यहां सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है, तो चूंइग गम यहां मेडिकल पर्पज से यूज होती है। इसलिए यह आपको अपना पासपोर्ट दिखाने के बाद मेडिकल स्टोर से मिलेगी। यही नहीं, अगर आपके पास किसी तरह की ड्रग्स पाई गई, तो आपको मौत की सजा तक सुनाई जा सकती है। पब्लिक स्पेस पर स्मोकिंग भी पूरी तरह बैन है। इसके अलावा, यहां पानी की बोतलें काफी महंगी हैं। आधे लीटर की बोतल के लिए आपको तकरीबन 3 डॉलर देने होंगे। वहां ट्रैवल करने का बेस्ट तरीका एएमआरटी, बस व ट्रेन हैं। मेट्रो स्टेशंस पर आपको प्रीपेड स्वाइप कार्ड्स आसानी से मिल जाएंगे। ट्रैफिक सिग्नल को भी ध्यान रखें, क्योंकि सादे कपड़ों में पुलिस वहां हमेशा तैनात रहती है। 

घूमने का पुण्य

त्रयम्बकेश्वर मंदिर देखने लाखों लोग हर साल आते हैं। दरअसल, यह पुण्य कमाने की चाहत के साथ-साथ घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों को इसलिए भी लुभाता है, क्योंकि इसके आसपास स्थित पहाड़ और यहां बहने वाली नदियों का कॉम्बिनेशन लोगों का मन मोह लेते हैं:

नासिक से 38 किलोमीटर दूर है त्रयम्बकेश्वर मंदिर। यहां आप कभी भी चले जाइए भक्तों का हुजूम देखने को मिलता है। इसे देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्रमुख माना जाता है, क्योंकि यहां त्रिदेव के दर्शन हो जाते हैं।

गोदावारी नदी के उद्गम स्थल और ब्रह्मगिरी की खूबसूरत पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में नागर वास्तु कला में बने इस मंदिर को देखना अपने आप एक उपलब्धि है। काले पत्थर से तैयार यह मंदिर अपनी प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला के कारण भी सैलानियों को आकर्षित करता है। 


यह मंदिर 270 वर्गफुट में फैला हुआ है। यहां स्वयंभू रूप में अंगूठे के आकार जितने बड़े तीन लिंग हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना गया है।

क्या देखें:
कुषवर्ता तीर्थ: ऐसा माना जाता है कि इस कुंड में स्नान कर लेने से आपके सभी कष्ट और पाप दूर होते हैं। इस स्थान का नाम कुषवर्ता इसलिए पड़ा, क्योंकि शिव से दूर हुई निराश व क्रोधित गंगा नदी यहां रुकती ही नहीं थी। इस कारण गौतम ऋषि गोहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए स्नान नहीं कर पा रहे थे। एक दिन परेशान आकर उन्होंने मंत्रित घास, जिसे संस्कृत में कुष कहते हैं, से घेरकर गंगा को यहां रुकने के लिए विवश कर दिया था। इसके चारों कोनों पर केदारेश्वर महादेव, साक्षी विनायक, कुषेशवर महादेव और गोदावरी मंदिर हैं। यहीं पास में इंद्रेश्वर महादेव का भी खूबसूरत मंदिर है।

ब्रह्मगिरी: मुख्य रूप से गंगा का मंदिर त्रयम्बकेशवर मंदिर से सटे ब्रह्मगिरी की पहाडि़यों पर ही स्थित है। इन पर्वतों पर नदी तीन दिशाओं में बह रही है। पूर्व की ओर बहती नदी को गोदावरी, दक्षिण की ओर बहने वाली को वैतरना और जो पश्चिम की ओर बहती है, उसे गंगा कहा जाता है। त्रयम्बकेशवर मंदिर के सामने ही अहिल्या नदी का संगम गोदावरी से होता है। इसमें स्नान करना नि:संतान लोगों के लिए काफी शुभ माना जाता है। समुद्रतल से 4248 फीट की ऊंचाई पर होने की वजह से यहां का वातावरण हमेशा ही काफी सुहावना बना रहता है।

अन्य दर्शनीय स्थल : यहां गौतम ऋषि की गुफा है , जिसमें 108 शिवलिंग बने हुए हैं। वहीं आगे जाकर नाथ संप्रदाय के सबसे पहले नाथ गोरखनाथ का भी मंदिर है। राम - लक्ष्मण तीर्थ भी यहीं हैं जहां अपने वनवास के दौरान कुछ दिन रुककर उन्होंने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। यहां राम जी का काफी विशाल मंदिर भी बना हुआ है। यहीं गंगासागर नाम का बड़ा सा कुंड भी बना हुआ है।

धार्मिक उत्सव : यहां जब बारह साल में एक बार बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करता है , तो सिंहस्ता कुंभ मेला मनाया जाता है। फरवरी में पूर्णिमा के दिनों में गोदावरी की पूजा करने देशभर से लोग लाखों की संख्या में आते हैं। यहां नवंबर में गंगा - गोदावरी पर्व भी बारह दिनों तक मनाया जाता है। जनवरी में निवृत्ति नाथ उत्सव तीन दिन खूब हर्षोउल्लास से मनाते हैं। नवंबर में ही त्रिपुरी पूर्णिमा के दिन त्रयम्बकेशवर महादेव की रथयात्रा निकाली जाती है। मार्च में महाशिवरात्रि के अवसर पर भी हर बारह साल में कुंभ मेला लगता है।

आस - पास अन्य दर्शनीय स्थल :
शिरडी - शिगनापुर : नासिक से 119 कि . मी . की दूरी पर ही शिरडी स्थित है , जहां साईं बाबा का फेमस मंदिर है। शिरडी के ही नजदीक शनिदेव का प्रसिद्ध मंदिर शनि शिगनापुर भी है। यहां शिला रूप में शनिदेव की पूजा - अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि शनिदेव के आशीर्वाद से यहां कोई बुराई नहीं प्रवेश पा सकती है , इसलिए यहां किसी घर में दरवाजे बंद नहीं होते।

अंजनेरी पर्वत : प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं जहां मॉनसून के समय पर्वत से गिरते झरने का नजारा बस उस माहौल में खो देने का मजबूर कर देता है। इसके अलावा गंगापुर बांध और दूधसागर के नाम से मशहूर झरने भी देखने लायक हैं। इसी के पास नंदूर - माधमेश्वर बर्ड सेनचुरी है , जहां दुनियाभर से आए पक्षियों को देखने का लुत्फ उठाने के साथ ही आपको प्रकृति के नजदीक होने का भी एहसास होता है।

कैसे जाएं :
बस से : त्रयम्बकेशवर के लिए महाराष्ट्र स्टेट ट्रांसपोर्टेशन की ओर से काफी बस सेवाएं उपलब्ध हैं। आप मुंबई , पुणे , सतारा , कोल्हापुर , अहमदाबाद और इंदौर से बस से सफर कर सकते हैं।
रेल से : देश के लगभग हर कोने से नासिक रोड स्टेशन और देवलाली स्टेशन तक रेल से पहुंचा जा सकता है। यहां से त्रयम्बकेशवर कुछ ही दूर है।

हवाई यात्रा : सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इस समय मुंबई है। जहां से त्रयम्बकेशवर तक जाने के लिए प्राइवेट टैक्सी मिल जाती है। हैं।

कहां ठहरे : अगर आपका प्लान काफी पहले बन गया है तो मंदिर के आसपास बने कुछ होटलों में रह सकते हैं। मुक्तिधाम में आकर आपको कई धर्मशालाएं भी वैसे रहने को मिल जाएंगी , जहां खाने - पीने का भी अच्छा इंतजाम है।
त्रयम्बकेश्वर मंदिर देखने लाखों लोग हर साल आते हैं। दरअसल, यह पुण्य कमाने की चाहत के साथ-साथ घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों को इसलिए भी लुभाता है, क्योंकि इसके आसपास स्थित पहाड़ और यहां बहने वाली नदियों का कॉम्बिनेशन लोगों का मन मोह लेते हैं:

मीनाक्षी झा
नासिक से 38 किलोमीटर दूर है त्रयम्बकेश्वर मंदिर। यहां आप कभी भी चले जाइए भक्तों का हुजूम देखने को मिलता है। इसे देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्रमुख माना जाता है, क्योंकि यहां त्रिदेव के दर्शन हो जाते हैं।

गोदावारी नदी के उद्गम स्थल और ब्रह्मगिरी की खूबसूरत पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में नागर वास्तु कला में बने इस मंदिर को देखना अपने आप एक उपलब्धि है। काले पत्थर से तैयार यह मंदिर अपनी प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला के कारण भी सैलानियों को आकर्षित करता है।

यह मंदिर 270 वर्गफुट में फैला हुआ है। यहां स्वयंभू रूप में अंगूठे के आकार जितने बड़े तीन लिंग हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना गया है।

क्या देखें:
कुषवर्ता तीर्थ: ऐसा माना जाता है कि इस कुंड में स्नान कर लेने से आपके सभी कष्ट और पाप दूर होते हैं। इस स्थान का नाम कुषवर्ता इसलिए पड़ा, क्योंकि शिव से दूर हुई निराश व क्रोधित गंगा नदी यहां रुकती ही नहीं थी। इस कारण गौतम ऋषि गोहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए स्नान नहीं कर पा रहे थे। एक दिन परेशान आकर उन्होंने मंत्रित घास, जिसे संस्कृत में कुष कहते हैं, से घेरकर गंगा को यहां रुकने के लिए विवश कर दिया था। इसके चारों कोनों पर केदारेश्वर महादेव, साक्षी विनायक, कुषेशवर महादेव और गोदावरी मंदिर हैं। यहीं पास में इंद्रेश्वर महादेव का भी खूबसूरत मंदिर है।

ब्रह्मगिरी: मुख्य रूप से गंगा का मंदिर त्रयम्बकेशवर मंदिर से सटे ब्रह्मगिरी की पहाडि़यों पर ही स्थित है। इन पर्वतों पर नदी तीन दिशाओं में बह रही है। पूर्व की ओर बहती नदी को गोदावरी, दक्षिण की ओर बहने वाली को वैतरना और जो पश्चिम की ओर बहती है, उसे गंगा कहा जाता है। त्रयम्बकेशवर मंदिर के सामने ही अहिल्या नदी का संगम गोदावरी से होता है। इसमें स्नान करना नि:संतान लोगों के लिए काफी शुभ माना जाता है। समुद्रतल से 4248 फीट की ऊंचाई पर होने की वजह से यहां का वातावरण हमेशा ही काफी सुहावना बना रहता है।

अन्य दर्शनीय स्थल : यहां गौतम ऋषि की गुफा है , जिसमें 108 शिवलिंग बने हुए हैं। वहीं आगे जाकर नाथ संप्रदाय के सबसे पहले नाथ गोरखनाथ का भी मंदिर है। राम - लक्ष्मण तीर्थ भी यहीं हैं जहां अपने वनवास के दौरान कुछ दिन रुककर उन्होंने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। यहां राम जी का काफी विशाल मंदिर भी बना हुआ है। यहीं गंगासागर नाम का बड़ा सा कुंड भी बना हुआ है।

धार्मिक उत्सव : यहां जब बारह साल में एक बार बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करता है , तो सिंहस्ता कुंभ मेला मनाया जाता है। फरवरी में पूर्णिमा के दिनों में गोदावरी की पूजा करने देशभर से लोग लाखों की संख्या में आते हैं। यहां नवंबर में गंगा - गोदावरी पर्व भी बारह दिनों तक मनाया जाता है। जनवरी में निवृत्ति नाथ उत्सव तीन दिन खूब हर्षोउल्लास से मनाते हैं। नवंबर में ही त्रिपुरी पूर्णिमा के दिन त्रयम्बकेशवर महादेव की रथयात्रा निकाली जाती है। मार्च में महाशिवरात्रि के अवसर पर भी हर बारह साल में कुंभ मेला लगता है।

आस - पास अन्य दर्शनीय स्थल :
शिरडी - शिगनापुर : नासिक से 119 कि . मी . की दूरी पर ही शिरडी स्थित है , जहां साईं बाबा का फेमस मंदिर है। शिरडी के ही नजदीक शनिदेव का प्रसिद्ध मंदिर शनि शिगनापुर भी है। यहां शिला रूप में शनिदेव की पूजा - अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि शनिदेव के आशीर्वाद से यहां कोई बुराई नहीं प्रवेश पा सकती है , इसलिए यहां किसी घर में दरवाजे बंद नहीं होते।

अंजनेरी पर्वत : प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं जहां मॉनसून के समय पर्वत से गिरते झरने का नजारा बस उस माहौल में खो देने का मजबूर कर देता है। इसके अलावा गंगापुर बांध और दूधसागर के नाम से मशहूर झरने भी देखने लायक हैं। इसी के पास नंदूर - माधमेश्वर बर्ड सेनचुरी है , जहां दुनियाभर से आए पक्षियों को देखने का लुत्फ उठाने के साथ ही आपको प्रकृति के नजदीक होने का भी एहसास होता है।

कैसे जाएं :
बस से : त्रयम्बकेशवर के लिए महाराष्ट्र स्टेट ट्रांसपोर्टेशन की ओर से काफी बस सेवाएं उपलब्ध हैं। आप मुंबई , पुणे , सतारा , कोल्हापुर , अहमदाबाद और इंदौर से बस से सफर कर सकते हैं।
रेल से : देश के लगभग हर कोने से नासिक रोड स्टेशन और देवलाली स्टेशन तक रेल से पहुंचा जा सकता है। यहां से त्रयम्बकेशवर कुछ ही दूर है।

हवाई यात्रा : सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इस समय मुंबई है। जहां से त्रयम्बकेशवर तक जाने के लिए प्राइवेट टैक्सी मिल जाती है। हैं।
कहां ठहरे : अगर आपका प्लान काफी पहले बन गया है तो मंदिर के आसपास बने कुछ होटलों में रह सकते हैं। मुक्तिधाम में आकर आपको कई धर्मशालाएं भी वैसे रहने को मिल जाएंगी , जहां खाने - पीने का भी अच्छा इंतजाम है।त्रयम्बकेश्वर मंदिर देखने लाखों लोग हर साल आते हैं। दरअसल, यह पुण्य कमाने की चाहत के साथ-साथ घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों को इसलिए भी लुभाता है, क्योंकि इसके आसपास स्थित पहाड़ और यहां बहने वाली नदियों का कॉम्बिनेशन लोगों का मन मोह लेते हैं:

मीनाक्षी झा
नासिक से 38 किलोमीटर दूर है त्रयम्बकेश्वर मंदिर। यहां आप कभी भी चले जाइए भक्तों का हुजूम देखने को मिलता है। इसे देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्रमुख माना जाता है, क्योंकि यहां त्रिदेव के दर्शन हो जाते हैं।

गोदावारी नदी के उद्गम स्थल और ब्रह्मगिरी की खूबसूरत पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में नागर वास्तु कला में बने इस मंदिर को देखना अपने आप एक उपलब्धि है। काले पत्थर से तैयार यह मंदिर अपनी प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला के कारण भी सैलानियों को आकर्षित करता है।

यह मंदिर 270 वर्गफुट में फैला हुआ है। यहां स्वयंभू रूप में अंगूठे के आकार जितने बड़े तीन लिंग हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना गया है।

क्या देखें:
कुषवर्ता तीर्थ: ऐसा माना जाता है कि इस कुंड में स्नान कर लेने से आपके सभी कष्ट और पाप दूर होते हैं। इस स्थान का नाम कुषवर्ता इसलिए पड़ा, क्योंकि शिव से दूर हुई निराश व क्रोधित गंगा नदी यहां रुकती ही नहीं थी। इस कारण गौतम ऋषि गोहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए स्नान नहीं कर पा रहे थे। एक दिन परेशान आकर उन्होंने मंत्रित घास, जिसे संस्कृत में कुष कहते हैं, से घेरकर गंगा को यहां रुकने के लिए विवश कर दिया था। इसके चारों कोनों पर केदारेश्वर महादेव, साक्षी विनायक, कुषेशवर महादेव और गोदावरी मंदिर हैं। यहीं पास में इंद्रेश्वर महादेव का भी खूबसूरत मंदिर है।

ब्रह्मगिरी: मुख्य रूप से गंगा का मंदिर त्रयम्बकेशवर मंदिर से सटे ब्रह्मगिरी की पहाडि़यों पर ही स्थित है। इन पर्वतों पर नदी तीन दिशाओं में बह रही है। पूर्व की ओर बहती नदी को गोदावरी, दक्षिण की ओर बहने वाली को वैतरना और जो पश्चिम की ओर बहती है, उसे गंगा कहा जाता है। त्रयम्बकेशवर मंदिर के सामने ही अहिल्या नदी का संगम गोदावरी से होता है। इसमें स्नान करना नि:संतान लोगों के लिए काफी शुभ माना जाता है। समुद्रतल से 4248 फीट की ऊंचाई पर होने की वजह से यहां का वातावरण हमेशा ही काफी सुहावना बना रहता है।

अन्य दर्शनीय स्थल : यहां गौतम ऋषि की गुफा है , जिसमें 108 शिवलिंग बने हुए हैं। वहीं आगे जाकर नाथ संप्रदाय के सबसे पहले नाथ गोरखनाथ का भी मंदिर है। राम - लक्ष्मण तीर्थ भी यहीं हैं जहां अपने वनवास के दौरान कुछ दिन रुककर उन्होंने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। यहां राम जी का काफी विशाल मंदिर भी बना हुआ है। यहीं गंगासागर नाम का बड़ा सा कुंड भी बना हुआ है।

धार्मिक उत्सव : यहां जब बारह साल में एक बार बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करता है , तो सिंहस्ता कुंभ मेला मनाया जाता है। फरवरी में पूर्णिमा के दिनों में गोदावरी की पूजा करने देशभर से लोग लाखों की संख्या में आते हैं। यहां नवंबर में गंगा - गोदावरी पर्व भी बारह दिनों तक मनाया जाता है। जनवरी में निवृत्ति नाथ उत्सव तीन दिन खूब हर्षोउल्लास से मनाते हैं। नवंबर में ही त्रिपुरी पूर्णिमा के दिन त्रयम्बकेशवर महादेव की रथयात्रा निकाली जाती है। मार्च में महाशिवरात्रि के अवसर पर भी हर बारह साल में कुंभ मेला लगता है।

आस - पास अन्य दर्शनीय स्थल :
शिरडी - शिगनापुर : नासिक से 119 कि . मी . की दूरी पर ही शिरडी स्थित है , जहां साईं बाबा का फेमस मंदिर है। शिरडी के ही नजदीक शनिदेव का प्रसिद्ध मंदिर शनि शिगनापुर भी है। यहां शिला रूप में शनिदेव की पूजा - अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि शनिदेव के आशीर्वाद से यहां कोई बुराई नहीं प्रवेश पा सकती है , इसलिए यहां किसी घर में दरवाजे बंद नहीं होते।

अंजनेरी पर्वत : प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं जहां मॉनसून के समय पर्वत से गिरते झरने का नजारा बस उस माहौल में खो देने का मजबूर कर देता है। इसके अलावा गंगापुर बांध और दूधसागर के नाम से मशहूर झरने भी देखने लायक हैं। इसी के पास नंदूर - माधमेश्वर बर्ड सेनचुरी है , जहां दुनियाभर से आए पक्षियों को देखने का लुत्फ उठाने के साथ ही आपको प्रकृति के नजदीक होने का भी एहसास होता है।

कैसे जाएं :
बस से : त्रयम्बकेशवर के लिए महाराष्ट्र स्टेट ट्रांसपोर्टेशन की ओर से काफी बस सेवाएं उपलब्ध हैं। आप मुंबई , पुणे , सतारा , कोल्हापुर , अहमदाबाद और इंदौर से बस से सफर कर सकते हैं।
रेल से : देश के लगभग हर कोने से नासिक रोड स्टेशन और देवलाली स्टेशन तक रेल से पहुंचा जा सकता है। यहां से त्रयम्बकेशवर कुछ ही दूर है।

हवाई यात्रा : सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इस समय मुंबई है। जहां से त्रयम्बकेशवर तक जाने के लिए प्राइवेट टैक्सी मिल जाती है। हैं।
कहां ठहरे : अगर आपका प्लान काफी पहले बन गया है तो मंदिर के आसपास बने कुछ होटलों में रह सकते हैं। मुक्तिधाम में आकर आपको कई धर्मशालाएं भी वैसे रहने को मिल जाएंगी , जहां खाने - पीने का भी अच्छा इंतजाम है। 

नॉर्थ इंडिया के पांच प्रमुख स्थान

ट्रैवलर्स के बीच अब नॉर्थ इंडिया काफी पॉपुलर हो गया है। अगर आप भी इस पार्ट को एक्सप्लोर करने के मूड में हैं, तो इन पांच जगहों को अपनी लिस्ट में शामिल करना न भूलें। बेशक यहां आपको एक अलग माहौल महसूस होगा :

हमारे देश में हर गांव की एक अपनी ही दिलचस्प कहानी है। ऐसे में अगर आपको नॉर्थ में कुछ फेवरिट स्पॉट्स तलाशने पड़ें, तो यह आसान नहीं है। हम आपको नॉर्थ के पांच ऐसे डेस्टिनेशन के बारे में बता रहे हैं, जहां जाकर आप अपनी व्यस्त जिंदगी को भुला सकेंगे।

ऋषिकेश और हरिद्वार
भले ही ये जगहें धार्मिक कारणों से मशहूर रही हों, लेकिन आज की जेनरेशन ने इस खूबसूरत जगह को एक तरह दोबारा ढूंढा है। यहां आपके देखने के लिए ढेरों मंदिर तो हैं ही, साथ में आप एडवेंचर से भरपूर शॉर्ट ट्रिप भी प्लान कर सकते हैं। वैसे, धार्मिक प्रभाव होने के कारण हरिद्वार और ऋषिकेश में आपको वेजिटेरियन फूड मिलेगा। 


ऋषिकेश जाने का खास आकर्षण है वाइट वॉटर राफ्टिंग। यहां की राफ्टिंग में जो थ्रिल महसूस होता है, वह दुनिया के किसी कोने के रोलर कोस्टर से कम नहीं है। लेकिन अगर राफ्टिंग आपको नहीं जमती, तो क्लिफ जंपिंग भी आजमा सकते हैं। इसमें आपको ज्यादा कुछ नहीं करना होता, बस एक टीले पर खड़े होकर नीचे आइस कोल्ड वॉटर में कूदी मारनी होती है। है न मजेदार!

और हां, जब आप हरिद्वार जाएं, तब आरती में शामिल होना न भूलें। गंगा के घाट के किनारे हर की पौड़ी की संध्या आरती मनमोहक होती है। इसके लिए आप जरूर समय निकालें।

अमृतसर
अमृतसर जाते ही सबसे पहला काम गोल्डन टेंपल में मत्था टेकने का करें। यहां का माहौल आपको असीम शांति से भर देगा। इस गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहब को सुनने के बाद जालियांवाला बाग भी घूम आइए। घूमने के बाद अगर भूख लग गई हो, तो गुरुदास राम मिठाईवाला के पास चले जाइए। यहां की जलेबी और गुलाबजामुन लाजवाब हैं।

इसके बाद आप कपड़ा मार्केट का रुख कर सकते हैं। अगर पटियाला सूट पसंद हों, तो यहां से शॉपिंग करें। मात्र चार घंटों में यहां पटियाला सूट स्टिच करवाए जा सकते हैं। यहां का लास्ट और बेस्ट डेस्टिनेशन वाघा बॉर्डर है। अब इसे अटारी-वाघा बॉर्डर के नाम से जाना जाता है। यहां भारतीय और पाकिस्तानी सैनिकों के झंडों के फहराने के आयोजन को मिस न करें।

औली
अगर आपको ऐसा लगता है कि स्कीइंग एक्सपेंसिव टाइम पास है , तो एक बार फिर सोचें ! उत्तराखंड की पहाड़ियों में बसा खूबसूरत औली ऐसी जगह है , जहां जाकर आपका मन स्कीइंग के लिए मचलने लगेगा। एशिया की सबसे लंबी (4 किमी ) केबल कार भी यहीं है। इतना ही नहीं , चेयर लिफ्ट और स्की - लिफ्ट भी हैं। औली में इंडो - तिब्बतन बॉर्डर पुलिस के ट्रेनिंग सेशन भी चलते हैं।

यहां के मौसम के बारे में पहले से कुछ भी कह पाना मुश्किल है , लेकिन जनवरी से मार्च का समय बेहतर है। औली से आप कई चोटियों के बेहतरीन नजारे देख सकते हैं। माना , कामेट जैसी चोटियों के अलावा , सबसे ऊंची चोटी नंदा देवी को भी आप यहां से निहार सकते हैं।

आगरा
आगरा जाने के लिए आप अपनी प्राइवेट गाड़ी यूज कर सकते हैं। अगर स्टेट ट्रांसपोर्ट बस से जाएंगे , तो आपका खर्च और भी कम हो जाएगा। कार से ट्रैवलिंग का खर्च दोनों तरफ से 3500 से 3700 रुपये के करीब आएगा। अगर आपके पास समय है , तो आप थोड़ी देर सिकंदरा में रुक सकते हैं। यहां अकबर का मकबरा है। और आगरा का मुख्य आकर्षण तो ताजमहल ही है , जिसके बारे में कुछ भी बताने की शायद हमें जरूरत नहीं है !

मसूरी
यहां का केंपटी फॉल बेहद खूबसूरत है। लेकिन यही बात मसूरी लेक के बारे में नहीं कही जा सकती। अगर शॉपिंग करने का मन हो तो तो मॉल रोड से वूलन कपड़े ले सकते हैं। कुलरी मार्केट में वुड वर्क्स और लैंडर मार्केट में रोडसाइड आइसक्रीम व डेजर्ट शॉप्स मिल जाएंगी।

इस हिल स्टेशन पर मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड का घर भी है। कुलरी मार्केट के एक बुक स्टोर में आप हर सैटरडे को शाम साढ़े तीन से साढ़े पांच के बीच रस्किन बॉन्ड से मिल भी सकते हैं। अगर आप सैटरडे को यहां नहीं पहुंच सके , तो आप बुक स्टोर वाले से बॉन्ड के घर का फोन नंबर ले सकते हैं। अगर वह शहर में होंगे , तो मुमकिन है कि आपको चाय पर अपने घर आमंत्रित करें। तो है न मसूरी की ट्रिप काम की ! 

सुबह ए बनारस

गंगा नदी के किनारे बसे उत्तर प्रदेश के इस शहर को बनारस या काशी भी कहा जाता है। वैसे , इसे देश की सांस्कृतिक राजधानी भी माना जाता है। हिंदू धर्म में इस शहर की खास मान्यता है और इस शहर में इतने मंदिर हैं कि हर सड़क से गुजरते हुए आपको एक मंदिर जरूर नजर आएगा। काशी विश्वनाथ मंदिर या गोल्डन टेंपल को 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने बनवाया था। यह यहां का सबसे मशहूर मंदिर है और यहां के शिवलिंग को लेकर लोगों में इसकी गहरी आस्था है। काल भैरव मंदिर , नेपाली हिंदू मंदिर , तुलसी मानस मंदिर , राम नगर फोर्ट वगैरह भी देखें।
यहां के दुर्गा मंदिर को लोग बहुत मानते हैं , तो वाराणसी के घाटों पर तो दुनिया भर का मेला रहता है।

शाम के समय गंगा किनारे होने वाली आरती का पर्यटकों के बीच खासा क्रेज है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों लिए भी यह शहर काफी मायने रखता है और उनके चार तीर्थ स्थलों में से एक है। भगवान बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष आपको आज भी यहां देखने को मिलेंगे। बता दें कि वाराणसी में देखने के लिए ऐसा खास कुछ नहीं है , लेकिन वहां के हर कोने को महसूस करते हुए वहां घूमना ही सही मायने में वाराणसी को देखना है। 


वहां आप आटो रिक्शा या रिक्शा से घूम सकते हैं। दिल्ली से वाराणसी की दूरी 776 किमी है। यहां आप बस , ट्रेन या हवाई मार्ग से आ सकते हैं। वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डा मुख्य शहर से 25 किमी दूर है , तो मुगल सराय यहां का मुख्य रेलवे जंक्शन है। ठहरने व खाने के मामले में आपको किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी। 

शिमोगा

शिमोगा कर्नाटक के खूबसूरत शहरों में से एक है और यह इसके सेंट्रल रीजन में टुंगा नदी के पास बसा है। बेंगलुरु से लगभग 300 किमी दूर बसे शिमोगा का नाम शिव - मुख से बना है , जिसका अर्थ है भगवान शिव का मुंह। शिमोगा पर कई वंशों ने राज किया है। दरअसल , यह कर्नाटक का सबसे उपजाऊ क्षेत्र है और यहां उगाई जाने वाली तमाम चीजों की क्वॉलिटी बेहतरीन होती है। पर्यटकों के बीच शिमोगा अपने खूबसूरत प्राकृतिक नजारों और खुशनुमा मौसम के चलते पॉपुलर है। वैसे , शिमोगा के आसपास कई आकर्षक वॉटर फाल्स भी हैं। इससे कुछ दूरी पर स्थित जोग फॉल्स यहां का सबसे प्रमुख आकर्षण हैं। यहां जाने का बेहतरीन समय अक्टूबर से मार्च के बीच है , जब नदियां व फॉल्स मॉनसून के बाद पानी से भरे होते हैं।

कर्नाटक के दूसरे शहरों की तरह हालांकि शिमोगा के पास हेरिटेज साइट्स नहीं हैं , लेकिन वॉटर फॉल्स के चलते पर्यटक यहां आना पसंद करते हैं। वैसे , शहर के आसपास बनी वाइल्डलाइफ सेंचुरियां भी लोगों को इसकी ओर खींचती हैं। मनगड्डे बर्ड सेंचुरी शिमोगा से 30 किमी दूर है , जहां के घने जंगल में तमाम प्रवासी पक्षी देखे जा सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार , अगस्त से लेकर अक्टूबर यानी मॉनसून के दौरान सेंचुरी में 5000 से भी ज्यादा पक्षी होते हैं। तायरेकोप्पा लॉयन सफारी भी घूमने की एक बेहतरीन जगह है। शिमोगा से 10 किमी दूर बसी इस सफारी में आप घने जंगलों में घूमने व जानवरों को मस्ती करते देखने का रोमांच ले सकते हैं। टुंगा एनिकट बांध भी देखने लायक जगह है , तो इससे 3 किमी आगे एलिफेंट कैंप जाया जा सकता है। इस कैंप में सुबह के समय जाने पर हाथियों को नहाते व खाना खाते देखना दिलचस्प रहेगा।

 यहां ठहरने के लिए आपको हर बजट के मुताबिक सुविधा मिलेगी। शिमेगा का नजदीकी एयरपोर्ट हुबली है , जो इससे 165 किमी दूर है। वैसे , मैंगलोर व बेंगलुरू भी इसके आस - पास हैं। शिमोगा का अपना रेलवे स्टेशन है और यहां के लिए बेंगलुरू व मैसूर से रेग्युलर ट्रेन मिलती हैं। 

ईस्ट दिल्ली की शान है संजय झील पार्क

ईस्ट दिल्ली में आप किसी बड़े पार्क में घूमना चाहते हैं, तो संजय झील पार्क इसके लिए एक बेहतरीन जगह है। यह पार्क अपनी खूबसूरती के लिए फेमस है। अनु चौहान ने लिया इसका एक जायजा :

आप ईस्ट दिल्ली में रहते हैं और मॉर्निंग वॉक के लिए कोई पार्क तलाश रहे हैं, तो ऐसी जगहें आपको कम ही मिलेंगी। लेकिन जो लोग मयूर विहार या विनोद नगर रहते हैं, उनके लिए एक बढि़या जगह है संजय झील पार्क। आप अगर इस पार्क में सुबह जाएंगे, तो यहां आपको वॉक करने वालों की खासी भीड़ मिलेगी।

बता दें कि 80 के दशक की शुरुआत में पटपड़गंज व मयूर विहार फेस-टू के पास यह जगह बहुत कीचड़ वाली हुआ करती थी, तब डीडीए ने इसे संजय झील पार्क में तब्दील किया। यह पार्क 176 एकड़ एरिया में फैला हुआ है और इसमें से 89 एकड़ एरिया झील को दिया गया है। झील के चारों तरफ गोलाकार पार्क बना हुआ है, जो मयूर विहार फेस-टू तक जाता है। यही नहीं, आसपास कॉलोनी में बारिश का जो भी पानी आता होता है, वह सब इसी झील में मिलता है। यहां के सिक्युरिटी गार्ड प्रकाश बताते हैं कि यहां रोजाना कई सौ लोग वॉक करने व घूमने आते हैं। सुबह व शाम के समय यहां अच्छी-खासी भीड़ देखी जा सकती है। वैसे, पार्क के एंट्रेस गेट के सामने ही एक स्कूल भी है और यह इसके स्टूडेंट्स का भी फेवरिट हैंगआउट स्पॉट है। 


 कॉलोनी के साथ हुआ विस्तार
जब 1989-90 में मयूर विहार के पॉकेट ई, डी और बी का विस्तार हुआ, तो डीडीए ने इस पार्क को और फैला दिया, ताकि आसपास के लोगों को सैरगाह के लिए एक अच्छी जगह मिल सके। अब यह पार्क पटपड़गंज से लेकर मयूर विहार फेस-टू तक लोगों की जरूरतों को पूरा करता है।

फूलों की बिखरी छटा
इस पार्क में घुसते ही आपको तमाम वैराइटी के रंग-बिरंगे फूल नजर आएंगे और इन्हें देखते ही आपका मन पार्क को 'फ्लावर पार्क' कहने का करेगा। बेशक इस रंगीन माहौल में आप देर तक घूमना चाहेंगे।

योगा शिविर
आप संजय झील पार्क में वॉक एंजॉय करने के अलावा और तरीकों से भी फिटनेस का ध्यान रख सकते हैं। दरअसल, यहां समय-समय पर योगा शिविर भी लगते हैं, जहां आप सेहत सुधार सकते हैं।

बोटिंग का भी मजा
यहां घूमने आने वालों के लिए बोटिंग एक स्पेशलिटी है। दरअसल , डीडीए ने यहां की झील को लोगों की आउटिंग के लिए तैयार किया है। ऐसे में बोटिंग का लुत्फ आप गर्मियों में सुबह 12 बजे से शाम 7 बजे तक उठा सकते हैं , तो सर्दियों में इसका समय सुबह 11 से शाम 6 बजे तक का है। यहां 10 साल से कम उम्र के बच्चे यहां अकेले बोटिंग नहीं कर सकते। यही नहीं , बोटिंग के दौरान किसी का भी ड्रिंक या स्मोक करना मना है। यहां पैडल बोट का किराया 50 रुपये है , जिसमें आप आधे घंटे तक घूम सकते हैं। इसमें एक बार में 4 लोग बोटिंग कर सकते हैं।

बतखों की संख्या है ज्यादा
जहां दिल्ली के बाकी पार्कों में पक्षी कम ही नजर आते हैं , वहीं यहां आपको इनका शोर खूब सुनाई देगा। दरअसल , यहां 200 से भी ज्यादा बतखें है , जिनकी हरकतें आप यहां बैठकर एंजॉय कर सकते हैं।

पिकनिक की बेस्ट जगह
अगर आप किसी शांत जगह पर कुछ पल बिताना या पिकनिक मनाना चाहते हैं , तो उसके लिए भी यह जगह बेस्ट है। यहां लोगों के आराम से बैठने के लिए शेड का भी बंदोबस्त किया गया है। चूंकि यह पार्क बहुत बड़ा है , इसलिए यहां फैमिलीज व स्कूल से भी बच्चे पिकनिक मनाने आते हैं।

झूले हैं खास
बच्चों को पिकनिक या घूमने का तभी मजा आता है , जब वहां उनकी पसंद के झूले भी हों। यहां कई तरह के झूले हैं , जिन्हें बच्चे काफी एंजॉय करते हैं।

पुल है अट्रैक्शन
आप पार्क में वॉक करते हुए बोर हो गए हैं , तो झील के ऊपर बने ब्रिज पर भी वॉक का भी लुत्फ उठा सकते हैं। यहां से आपको पूरे पार्क की ग्रीनरी भी साफ दिखाई देगी।

फाउंटेन का क्या कहना
पार्क को खूबसूरत बनाने के लिए यहां पर फाउंटेन भी लगाए गए हैं। मॉनसून के मौसम इनसे पार्क की खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है।

झील को गंदा करते इलाके
हालांकि झील की समय - समय पर सफाई की जाती रहती है , लेकिन आसपास के इलाकों का गंदा पानी इस झील में गंदगी भर देता है। झील के पास त्रिलोकपुरी व आसपास के कारखानों का गंदा पानी भी इसमें आता है , तो लोग इसमें कूड़ा - कचरा भी डाल देते हैं।

खास सुविधाएं
चूंकि यहां बहुत सारे लोग आते हैं , इसलिए जगह - जगह पर टॉयलेट की फैसिलिटी रखी गई है। इसके अलावा , यहां एक नर्सरी हैं , तो बुजुर्गों के बैठने के लिए ओल्ड पीपल कॉर्नर भी हैं , ताकि उन्हें बैठने में किसी तरह की परेशानी ना हो। 

इंटरटेनमेंट और कल्चर का अनूठा हब

दिल्ली एयरपोर्ट से 20 किमी दूर गुड़गांव में है इंटरटेनमेंट का खजाना 'किंग्डम ऑफ ड्रीम्स'। सेक्टर 29 में करीब नौ एकड़ में बने इस कल्चर हब की लागत 110 करोड़ रुपये आई है। इस मनोरंजन हब में कल्चर गली, नौटंकी महल, शोशा थियेटर और आइफा बज्ज नाम से अलग-अलग सेंटर हैं।

कल्चर गली

करीब एक हजार स्क्वेयर फुट में फैली कल्चर गली दिल्ली हाट का बेहतर रूप है। इसमें 14 राज्यों के पविलियन हैं, जिनमें इन राज्यों के खानपान, क्राफ्ट, कल्चर आदि से जुड़ी चीज उपलब्ध है। एंटीक चीजों के लिए खास रिटेल सेंटर भी हैं। पविलियनों में उस राज्य से संबंधित पहनावे व परंपरागत सौगातें मौजूद हैं। कल्चर गली में घुसते ही ऐसा लगता है, मानो घने बादलों के बीच आ गए हों। इसकी छत इस तरह बनाई गई है कि जब तक अंदर रहते हैं, बादलों से घिरी शाम का अहसास होता रहता है। दूसरे फ्लोर पर जाने पर लगता है, जैसे किसी हिल स्टेशन की सैर कर रहे हों। 


आइफा बज्ज

फिल्मी हलचल के लिए यहां आइफा बज्ज नामक हॉल बनाया गया है, जिसमें पुराने जमाने की फिल्मों के पोस्टर लगाए गए हैं। यह एक सिनेमा लॉज है, जहां आकर नामी-गिरामी फिल्मी कलाकार अपना जलवा बिखेरते रहेंगे। इससे अमिताभ बच्चन, करण जौहर, विवेक ओबराय, दीया मिर्जा, शंकर अहसान लॉय जैसे कलाकारों के नाम जुड़े हैं। ये लोग वक्त-वक्त पर यहां परफॉर्म करते रहेंगे। हाल में प्रियंका चोपड़ा के अलावा सलमान खान अपनी फिल्म 'दबंग' की टीम के साथ यहां का दौरा कर चुके हैं।

नौटंकी महल

देश का पहला 4-डी आर्ट थियेटर है, जिसके दर्शकों के लिए इसी महीने खुलने के आसार हैं। यह राजमहल जैसा दिखता है। महल में 846 लोगों के बैठने की जगह है।

शोशा थियेटर

कला मंच और पौराणिक कथाओं पर आधारित शोशा थियेटर इस हब को अलग पहचान देता है। यहां ट्रडिशन और मॉडर्न कल्चर का मिक्चर देखने को मिलता है। यह एक अद्भुत ड्रामा सेंटर है, जिससे देश के कई नामी रंगमंच कलाकार जुड़े हैं। इस थियेटर में बैठने के लिए 925 सीटें हैं। यह अभी खुला नहीं है।

टाइमिंग और फीस

किंग्डम ऑफ ड्रीम्स में एंट्री के लिए 750 रुपये खर्च करने होंगे। बच्चों के लिए कोई छूट नहीं है। टिकट में खानपान शामिल नहीं है। फिलहाल दो सेंटर बंद हैं। इस कारण 750 रुपये का टिकट कुछ ज्यादा ही लगता है। यह हफ्ते में छह दिन दोपहर 1 बजे से रात 1 बजे तक खुला रहता है। सोमवार को छुट्टी रहती है। आर्ट, कल्चर, खानपान आदि का मजा एक ही जगह पर लेने के लिए यह बेहतर जगह है।

कहां : गुड़गांव के सेक्टर 29 में
टिकट : 750 रुपये, बच्चों को कोई छूट नहीं
टाइमिंग : दोपहर 1 से रात 1 बजे तक, सोमवार को छुट्टी 

'साउथ का चेरापूंजी' यानी तमिलनाडु का वालपराई

'साउथ का चेरापूंजी' यानी तमिलनाडु का वालपराई वाकई बेहद हसीन है। वेस्टर्न घाट में अन्नामलाई रेंज में बसा यह हिल स्टेशन चाय व कॉफी के बागानों, मॉन्की फॉल्स और परमबिकुलम, अलियार, निरार, शोलेयार जैसे बांधों के चलते मशहूर है। इंदिरा गांधी वाइल्ड लाइफ सैंचरी में हाथी की सवारी बेहद रोचक रहेगी, तो ट्री हाउस में रहना भी जरूर ट्राई करें। फिर हर्ब्स की खुशबू वाली हवा में घूमना आपको लंबे समय तक फ्रेश रखेगा। यहां होटलों की सुविधा अच्छी है, जिनकी रेंज 500 से 1000 रुपये के बीच रहेगी।

अगर पुराने समय को महसूस करना चाहते हैं, तो द स्टैनमोर बंगले में ठहरें। ब्रिटिशों के समय के इस बंगले तक पहुंचने के लिए आपको कम से कम 40 हेयरपिन बेंड्स से गुजरना होगा। यहां से पोलाची सबसे नजदीकी शहर है, जो 64 किलोमीटर की दूरी पर है। या फिर आप कोयंबटूर पहुंचकर फ्लाइट या ट्रेन ले सकते हैं। हरियाली भरे रास्तों की यह यात्रा आपको बेहद सुखद लगेगी। यहां सैंचुरीज में आप ट्रेकिंग या सफारी टूर के लिए जा सकते हैं। 


अगर लकी रहे, तो आपको टाइगर भी नजर आ सकता है। वैसे, यह जगह कैंपिंग के लिए परफेक्ट है। यहां की रातें बेहद खूबसूरत होती हैं और अच्छी बोनफायर से आप यादगार वक्त बिता सकते हैं। अगर नजारों का भरपूर लुत्फ लेना चाहते हैं, तो अपना वीकल हायर करें।

आस्था भरी खूबसूरती यानी पुरी

हिलगिरी, नीलाद्रि, हिलाचल, पुरुषोत्तम, संखक्षेत्र, जगन्नाथ धाम और जगन्नाथ पुरी- जाने कितने ही नाम रहे हैं पुरी के। उड़ीसा की यह खास जगह बंगाल की खाड़ी व सुनहरी रेत वाले बीच और भगवान जगन्नाथ के मंदिर के चलते काफी मशहूर है। पूर्णिमा की रात समुद्री लहरें देखने लायक होती हैं, तो शहर के हर कोने में भगवान जगन्नाथ का प्रभाव साफ नजर आता है। तभी तो यहां आपको पुरोहितों व पंडों की कोई कमी नहीं मिलेगी।

जगन्नाथ मंदिर
यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। भगवान कृष्ण को समर्पित होने की वजह से इस मंदिर का खास महत्व है और इसकी शिल्प कला देखने लायक है। उडि़या स्थापत्य कला का प्रतीक यह मंदिर देश के चार धामों में एक है और इसमेंं हिंदुओं के अलावा किसी और को जाने की इजाजत नहीं है। मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है और इसके शिखर पर भगवान विष्णु का श्रीचक्र है। इसे नीलचक्र भी कहा जाता है। वैसे, मंदिर की रसोई भी कुछ कम नहीं है। यहां की विशाल रसोई में भगवान का महाप्रसाद बनता है। यहां करीब 500 रसोइये और उनके 300 सहयोगी काम करते हैं।

 सूर्य मंदिर
कोणार्क के सूर्य मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। भगवान सूर्य के रथ के रूप में बना हुआ यह मंदिर कलिंग शैली का है। रथ को सात घोड़ों को खींचते हुए दिखाया गया है, जिसमें से अब एक ही घोड़ा बचा है। रथ के पहिए कोणार्क की पहचान बन गए हैं और इसके 12 चक्र साल के 12 महीनों को बताते हैं। लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट पत्थर से इसे राजा नृसिंहदेव ने बनवाया था और यह शिल्प कला का एक बेजोड़ नमूना है। अंग्रेजी में इसे 'ब्लैक पगोड़ा' भी कहते हैं।

चिल्का लेक
करीब 85 किमी की दूरी पर चिल्का लेक है। अगर यहां जाएं , तो बोटिंग का मजा जरूर लें। यहां आपको लाल केकड़े दिखेंगे , जो कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे। उछलती डॉल्फिन के अलावा , कई अप्रवासी पंछी भी यहां आपको नजर आएंगे। 70 किमी लंबी और 30 किमी चौड़ी यह झील समुद्र का ही हिस्सा है। महानदी की लाई गई मिट्टी के जमा हो जाने से समंदर से अलग होकर यह हिस्सा एक झील में बदल गया। गौरतलब है कि भारत की नाशपाती के आकार वाली यह देश की सबसे बड़ी और विश्व की दूसरी सबसे बड़ी समुद्री झील है। इसके एक ओर नीला सागर और दूसरी ओर हरी - भरी पहाडि़यां मिलकर मोहक नजारा बनाती हैं।

रथयात्रा
जगन्नाथ मंदिर का सालाना रथयात्रा उत्सव न्यूज चैनलों की सुर्खियों में रहता है। मंदिर के तीनों देवता , भगवान जगन्नाथ , उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा तीन शानदार रथों में यात्रा पर निकलते हैं। इसे देखने के लिए जुलाई में यहां ढेरों पर्यटक आते हैं।

पुरी बीच फेस्टिवल
पुरी का समंदर बहुत ही लंबा है और चौड़ा भी। यहां आकर आध्यात्मिक शांति महसूस होती है। हर साल नवंबर में होने वाला पुरी बीच फेस्टिवल टूरिस्टों को अपनी ओर खींचता है। इस सेलिब्रेशन के दौरान रोड शो और फैशन शो होते हैं। तरह - तरह की खरीदारी भी इस दौरान कर सकते हैं। लोकल लोगों से बातचीत का मौका भी मिलता है। बीच के आसपास विजिटर्स के रहने का इंतजाम भी होता है।
यह भी देखें
पास में ही पीपली गांव है। यहां का एप्लीक वर्क मशहूर है। इसके अलावा , रघुराजपुर और बालाकाटी गांव के हस्तशिल्पकारों से भी मिलना न भूलें।

शॉपिंग
शाम घिरते ही पुरी के सी - बीच पर एक छोटा मार्केट - सा लग जाता है और तब शांत समंदर के तट पर शोरगुल सुनाई देने लगता है। सीप से बनी चीजें यहां आपको खूब मिलेंगी। हैंडीक्राफ्ट , कल्चर्ड मोती , नक्काशीदार पत्थर और मूर्तियां आप यहां से खरीद सकते हें। शॉपिंग करते समय बार्गेन करना मत भूलिए।

कैसे पहुंचें
नजदीकी एयरपोर्ट भुवनेश्वर का बीजू पटनायक एयरपोर्ट है। यह पुरी से मात्र 56 किमी की दूरी है। टैक्सी से यह दूरी तय कर सकते हैं। दिल्ली से यह एयरपोर्ट कनेक्टेड है। नई दिल्ली से पुरी रेलवे स्टेशन के लिए नियमित ट्रेनें हैं। साईटसीइंग के लिए उड़ीसा टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की डीलक्स बसें भी उपलब्ध हैं। इनमें बैठकर आप भुवनेश्वर , कोणार्क और कटक तक की सैर कर सकते हैं।
कब जाएं
पुरी जाने का बेहतरीन समय नवंबर से मार्च के बीच है। वैसे , यहां पूरे साल जाया जा सकता है।

कहां ठहरें
यहां ठहरने के लिए आपके पास सीसाइड रिजॉर्ट , लग्जरी होटल , होम स्टे जैसे तमाम ऑप्शंस हैं। इसके अलावा , कुछ गेस्ट हाउस भी हैं। यानी आप बजट से लेकर लग्जरी स्टे के बीच अपनी चॉइस के हिसाब से ठहरने का प्रोग्राम बना सकते हैं।
हिलगिरी, नीलाद्रि, हिलाचल, पुरुषोत्तम, संखक्षेत्र, जगन्नाथ धाम और जगन्नाथ पुरी- जाने कितने ही नाम रहे हैं पुरी के। उड़ीसा की यह खास जगह बंगाल की खाड़ी व सुनहरी रेत वाले बीच और भगवान जगन्नाथ के मंदिर के चलते काफी मशहूर है। पूर्णिमा की रात समुद्री लहरें देखने लायक होती हैं, तो शहर के हर कोने में भगवान जगन्नाथ का प्रभाव साफ नजर आता है। तभी तो यहां आपको पुरोहितों व पंडों की कोई कमी नहीं मिलेगी।

जगन्नाथ मंदिर
यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। भगवान कृष्ण को समर्पित होने की वजह से इस मंदिर का खास महत्व है और इसकी शिल्प कला देखने लायक है। उडि़या स्थापत्य कला का प्रतीक यह मंदिर देश के चार धामों में एक है और इसमेंं हिंदुओं के अलावा किसी और को जाने की इजाजत नहीं है। मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है और इसके शिखर पर भगवान विष्णु का श्रीचक्र है। इसे नीलचक्र भी कहा जाता है। वैसे, मंदिर की रसोई भी कुछ कम नहीं है। यहां की विशाल रसोई में भगवान का महाप्रसाद बनता है। यहां करीब 500 रसोइये और उनके 300 सहयोगी काम करते हैं। 

सूर्य मंदिर
कोणार्क के सूर्य मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। भगवान सूर्य के रथ के रूप में बना हुआ यह मंदिर कलिंग शैली का है। रथ को सात घोड़ों को खींचते हुए दिखाया गया है, जिसमें से अब एक ही घोड़ा बचा है। रथ के पहिए कोणार्क की पहचान बन गए हैं और इसके 12 चक्र साल के 12 महीनों को बताते हैं। लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट पत्थर से इसे राजा नृसिंहदेव ने बनवाया था और यह शिल्प कला का एक बेजोड़ नमूना है। अंग्रेजी में इसे 'ब्लैक पगोड़ा' भी कहते हैं।

चिल्का लेक
करीब 85 किमी की दूरी पर चिल्का लेक है। अगर यहां जाएं , तो बोटिंग का मजा जरूर लें। यहां आपको लाल केकड़े दिखेंगे , जो कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे। उछलती डॉल्फिन के अलावा , कई अप्रवासी पंछी भी यहां आपको नजर आएंगे। 70 किमी लंबी और 30 किमी चौड़ी यह झील समुद्र का ही हिस्सा है। महानदी की लाई गई मिट्टी के जमा हो जाने से समंदर से अलग होकर यह हिस्सा एक झील में बदल गया। गौरतलब है कि भारत की नाशपाती के आकार वाली यह देश की सबसे बड़ी और विश्व की दूसरी सबसे बड़ी समुद्री झील है। इसके एक ओर नीला सागर और दूसरी ओर हरी - भरी पहाडि़यां मिलकर मोहक नजारा बनाती हैं।

रथयात्रा
जगन्नाथ मंदिर का सालाना रथयात्रा उत्सव न्यूज चैनलों की सुर्खियों में रहता है। मंदिर के तीनों देवता , भगवान जगन्नाथ , उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा तीन शानदार रथों में यात्रा पर निकलते हैं। इसे देखने के लिए जुलाई में यहां ढेरों पर्यटक आते हैं।

पुरी बीच फेस्टिवल
पुरी का समंदर बहुत ही लंबा है और चौड़ा भी। यहां आकर आध्यात्मिक शांति महसूस होती है। हर साल नवंबर में होने वाला पुरी बीच फेस्टिवल टूरिस्टों को अपनी ओर खींचता है। इस सेलिब्रेशन के दौरान रोड शो और फैशन शो होते हैं। तरह - तरह की खरीदारी भी इस दौरान कर सकते हैं। लोकल लोगों से बातचीत का मौका भी मिलता है। बीच के आसपास विजिटर्स के रहने का इंतजाम भी होता है।
यह भी देखें
पास में ही पीपली गांव है। यहां का एप्लीक वर्क मशहूर है। इसके अलावा , रघुराजपुर और बालाकाटी गांव के हस्तशिल्पकारों से भी मिलना न भूलें।

शॉपिंग
शाम घिरते ही पुरी के सी - बीच पर एक छोटा मार्केट - सा लग जाता है और तब शांत समंदर के तट पर शोरगुल सुनाई देने लगता है। सीप से बनी चीजें यहां आपको खूब मिलेंगी। हैंडीक्राफ्ट , कल्चर्ड मोती , नक्काशीदार पत्थर और मूर्तियां आप यहां से खरीद सकते हें। शॉपिंग करते समय बार्गेन करना मत भूलिए।

कैसे पहुंचें
नजदीकी एयरपोर्ट भुवनेश्वर का बीजू पटनायक एयरपोर्ट है। यह पुरी से मात्र 56 किमी की दूरी है। टैक्सी से यह दूरी तय कर सकते हैं। दिल्ली से यह एयरपोर्ट कनेक्टेड है। नई दिल्ली से पुरी रेलवे स्टेशन के लिए नियमित ट्रेनें हैं। साईटसीइंग के लिए उड़ीसा टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की डीलक्स बसें भी उपलब्ध हैं। इनमें बैठकर आप भुवनेश्वर , कोणार्क और कटक तक की सैर कर सकते हैं।
कब जाएं
पुरी जाने का बेहतरीन समय नवंबर से मार्च के बीच है। वैसे , यहां पूरे साल जाया जा सकता है।

कहां ठहरें
यहां ठहरने के लिए आपके पास सीसाइड रिजॉर्ट , लग्जरी होटल , होम स्टे जैसे तमाम ऑप्शंस हैं। इसके अलावा , कुछ गेस्ट हाउस भी हैं। यानी आप बजट से लेकर लग्जरी स्टे के बीच अपनी चॉइस के हिसाब से ठहरने का प्रोग्राम बना सकते हैं।